हिम्मत ना हार # जिंदगी की किताब (पन्ना # 342)

तु तकदीर को हरदम क्यो रोता है इंसान हिम्मत से चलता चल तदबीर को बना ले साथी हिम्मत का भगवान हिमायती ऐसी वो अद्भुत शक्ति है जिसका वार ना जाता ख़ाली चलाकर तो देख हिम्मत के इस तीर को अगर पुरूषार्थ तजकर के ऑसू यूँ ही बहायेगा सुनहरा समय बीत गया तो पीछे कौन पछतायेगा…

आधुनिकता के नाम पर # गर्भपात # जिंदगी की किताब (पन्ना # 341)

पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव से भारतीय संस्कृति की पवित्रता के साथ गरिमा खंडित होती जा रही है । ऐसे विषमय वातावरण से आचार शुद्धि की नींव दिन पर दिन खोखली व कमज़ोर होती जा रही है । अब तो जागो इंसानो कब तक यूँ ही सोते रहोगे आधुनिकता के नाम पर करोड़ो बच्चो की…

बाल दिवस की शुभकामनायें # जिंदगी की किताब (पन्ना # 333)

बच्चे परिवार की आत्मा है तो समाज की रीढ़ की हड्डी है । बच्चो की सहजता,निश्छलता,सरलता दूसरो के काम आने की सहभागिता होती है। जज्बा,जिज्ञासा,समर्पण,सदभाव बच्चो जैसी कही नही होती है । बच्चा होना कल्याणकारी है और मासूमियत होना सुकुन की बात है । बच्चे तो देश के भाग्य विधाता है। मंदिरों मे भी भगवान…

खुशी # जिंदगी की किताब (पन्ना # 329)

  हर रोज आती छोटी खुशियॉ की घड़ी  कल रात दरवाज़े पर दस्तक पड़ी  सामने खडी थी खुशियॉ बड़ी । मैने बहुत खुशी से बोला हर पल दिल से स्वागत है तुम्हारा । छोटी छोटी खुशियॉ से भी बहुत खुश हूँ । लेकिन जाओ उन सब के यहॉ, जहॉ मुझसे से भी ज्यादा जरूरत है…

आओ सैर करे प्रकृति की पाठशाला की – जिंदगी की किताब (पन्ना # 317)

चलो आज सैर करे प्रकृति की पाठशाला की और ऐसी पाठशाला जो कॉलेज, स्कूलों मे नही वरन वनों से उत्पन्न हुई है  जो संस्कारमय बोध का पाठ उपहार स्वरूप प्राप्त करवाती है । जो सुंदरता ही नहीं वरन इंसान के व्यक्तित्व को भी निखारती है। धन्य है वे महापुरूष जो संसार के कौलाहल से हटकर …

सुख- दुख — जिंदगी की किताब (पन्ना # 316)

सुख दुख सिक्के के दो पहलू है  बारी बारी से आते है और चले जाते है !! दिन डूब गया और अंधेरा छा गया  उषा मुस्कराई और उजाला आ गया किसी वक्त दिन तो किसी वक्त रात है  वैसे ही सुख दुख दोनो संग साथ है !!  पतझड़ ऋतु आई , शुष्क रहकर पेड ने…

ज़माने की बात – जिंदगी की किताब (पन्ना # 310)

ज़माने की बात …. शहर -शहर मे पाषाण के घर है कच्चे घर अब रखता है कौन ? ठंडी हवाओ के लिये एयर कंडीशन है  रोशनदान अब कौन रखता है कौन ? अपने घर से निजात मिले तो गैरो की सुने , पराई दीवार पर कान अब रखता है कौन है ? खुद ही पंख…

धरती(दिल को छूने वाली बात) – जिंदगी की किताब (पन्ना # 306)

“इंसान “ ने पूछा पृथ्वी से “हे पृथ्वी “ तु इतनी क्यूँ कंजूस है ? हम इंसानो से कड़ी मेहनत करवाकर  एडी चोटी का जोर लगवाकर खून पसीना बहाने के बाद ही हम सब को अन्न का सौग़ात देती है  यदि खून पसीना बहाये बिना ही  तु हमे अन्न दे दिया करे  तो तेरा क्या नुकसान…

नाम – जिंदगी की किताब (पन्ना # 298)

मैने रद्दी काग़ज़ों के रूप मे  सड़कों पर उड़ते अनेक नाम देखे है  जो मरने से पहले  नाम की चाह मे  जीवन भर मरते रहे  जिनमें ठेले वाले चना मूँगफली भरते रहे है । आपकी आभारी विमला मेहता  जय सच्चिदानंद 🙏🙏

जिद -जिंदगी की किताब (पन्ना 294)

ख़ुद को ही जीतना है  ख़ुद को ही हराना है  ना जाने ये कैसी जिद जो सोचती है हर क़दम  क्यॉ भीड़ हूँ मै इस दुनिया की ? मेरे अंदर भी रचता बसता एक ज़माना है उसे ज़ीने व पूरा करने का अफसाना है  आपकी आभारी विमला मेहता  जय सच्चिदानंद 🙏🙏

नासमझी का दुख -जिंदगी की किताब (पन्ना # 278)

सोचो तो जगत मे चहुँ और दुख ही दुख कँपायेगा  पर समझो तो इस दुनिया मे दुख जैसा कुछ भी नही समझ आयेगा  सारे दुख तो नासमझी के है !! चाहे जलचर हो या नभचर,या चाहे हो थलचर सबकी है अपनी कहानी !! कितने असंख्यात बेबस ,लाचार मूक और निरीह प्राणी भरे पड़े है इस…

 ढूँढती हूँ मै -जिंदगी की किताब (पन्ना # 255)

निराशा की परछाइयों  मे  आशा की किरण ढूँढती हूँ !!  डूबे हुए किनारों पर मैं  रेत का निशान ढूँढती हूँ !! हर एक संबंधो मे प्यार का अहसास ढूँढती हूँ !! किसी गुज़रे हुये मुसाफ़िर के पैरों के निशान ढूँढती हूँ !! बहते इक तूफ़ान के बाद  ठहराव की मंजिल ढूँढती हूँ !! खोये हुये…