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क्रोध, गुस्सा, नफरत ये सब धीमा जहर हैं
इन्हें पीते हम खुद हैं और सोचते हैं मरेगा
नज़र और नसीब का कुछ ऐसा इत्तेफाक हैं कि
नज़र को अक्सर वही चीज़ पसंद आती हैं
जो नसीब में नहीं होती
और नसीब में लिखी चीज़ अक्सर नज़र नहीं आती

आपकी आभारी विमला विल्सन मेहता
जय सच्चिदानन्द 🙏🙏