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तारीफ़ और ख़ुशामद में एक बड़ा फर्क है

तारीफ़ आदमी के काम की होती है,
और ख़ुशामद काम के आदमी की
हमारे अपनों की आवाज़ हम तक पहुँचे भी तो कैसे
आवाज़ धीमी हो तो आदतन अनसुनी कर देते है
बुलंद आवाज हो तो हमारे ग़ुरूर को चोट पहुँचाती है

आपकी आभारी विमला विल्सन मेहता
जय सच्चिदानन्द 🙏🙏