कालचक्र भाग (आरा) – पॉच # जिंदगी की किताब (पन्ना # 419)

5. पंचम आरा ….जो अभी चल रहा है

 दुषमा काल 

शास्त्रों के अनुसार छ: आरे होते है । चार आरों के बारे मे आपको जानकारी मिल चुकी है । चौथे आरे की समाप्ति पर 21,000 वर्ष की अवधि वाला पॉचवां दुख वाला आरा आरम्भ होता है । अभी कलयुग मे पॉचवां आरा चल रहा है । पाँचवे आरे मे 2026(विक्रम संवत)वर्ष पूरें हो चुके है । अब 18,974 वर्ष बचें है । इस पंचम आरें को कलयुग कहा है । ज्यों ज्यों इस आरे का समय बीतता जायेगा त्यों त्यों दुखद स्थिती बनती जायेगी ।

भारतवर्ष का वर्तमान पॉचवां काल अवसर्पिणी का पॉचवां आरा है । इसमे देहमान घटते घटते सात हाथ ऊँचाई का रह जाता है । इसमे वर्ण , गंध , रस ,स्पर्श आदि गुणवता मे कमी आने लगती है । आयु 120 वर्ष , मेरूदण्ड मे अस्थि संख्या 24 होती है । इसमे दिन मे दो बार आहार खाने की इच्छा होती है । इस आरे मे दान देने की प्रथा मे परिवर्तन होता है । अपना नाम हो तथा सम्मान मिले इसी हिसाब से दान करने की भावना रहती है । आस्तिकता की जगह नास्तिकता चारों और जड़े जमाये दिखाई देती है । सारांश मे कहने का तात्पर्य यह है कि यह आरा सब आरों से दुखदायी और पाप प्रवतर्क होता है । इस आरे की समाप्ति मे साधु संतों का नाम कही भी सुनने को नही मिलेगा । केवल एक साधु, एक साध्वी ओर उनका एक उपासक , एक उपासिका रह जायेंगे जो इस आरे की समाप्ति के साथ ही स्वर्ग चले जायेंगे व एक भव करके मोक्ष जाने वाले रहेंगे । 

पॉचवे आरे के लक्षण निम्नानुसार है ….

1. शहर गॉव जैसे होंगे 

2. गॉव श्मशान जैसे होंगे 

 3. पुत्र स्वच्छन्दाचारी होगें 

4. कुलवान नारीयां वेश्या जैसी बनेगी 

5. साधु कषायवंत होगें।

6. राजा यमदंड जैसे होगें।

7. कुटुंबीजन दास जैसे होगें।

8. प्रधान लोंभी जैसे होगे।

9. सुखीजन निर्लज्ज बनेंगें।

10. शिष्य गुरु का अपमान करनें और सामनें बोलनें वालें होगें।

11. दुर्जन पुरुष सुखी होगें।

12. सज्जन पुरुष दुःखी होगें।

13. मनुष्य कों देव कें दर्शन नहीं होगें।

14. पृथ्वी खराब तत्वों,दुष्ट तत्वों से आकुल व्याकुल होगी।

15. ब्राह्मण अस्वाध्यायी अर्थ लुब्ध बनेगें, विद्या का व्यापार होगा।

16. साधु गुरु के कहने में नहीं रहेंगें।

17. देव और मनुष्य अल्प बल वालें होगें।

18. देश दुर्भिक्ष अकाल की समस्या सें घिरा होगा।

19. गोरस रसहीन -कस्तुरी आदि वर्ण प्रभावहीन होगें।

20. विद्या, मंत्रों तथा औषधीयों का प्रभाव अल्प होगा।

21. बल ,धन ,आयुष्यहीन होगें।

22. मासकल्प योग्य क्षैत्र नही रहेंगें।

23. भगवान की प्रतिमाएं खंडित की जाएंगी।

24. आचार्य शिष्यों कों नही पढ़ाएगें।

25. शिष्य कलह और लड़ाई करनें वाले होगें।

26. मुंडन करनें वालें साधु कम होगें , दीक्षा लेगें ,पर पालन कम करनें वालें होगें।

27. आचार्य अपनी-अपनी मनगढंत बाते प्रगट करनेंवालें होगें।

28. म्लेच्छों (मोगल) कें राज्य बलवान होगें।

29. आर्य देश कें राजा अल्प बल वाले होगें।

30.मिथ्या दृष्टि देव बलवान होगें।

31. झूठ-कपट का बोलबाला होगा ओर बढ़ता जायेगा 

32. किसी के लग्न (शादी) किसी के भी साथ होगें ।

33. अनीति करनें वालें लोगों की आपस में एक दुसरें से खूब बनेगी।

34. धर्म करनें वालों को सम्पूर्णं सफलता नही मिलेगी।

35.  सत्य बोलने वालें की हार होगी सत्य बोलना निष्फल होगा।

इस आरे की समाप्ति के समय “शकेन्द्र “आकर ,कल छट्ठा आरा लगेगा ,ऐसी उदघोषणा करेगा ,जिसे सुनकर चारों (साधु ,साध्वी , श्रावक ,श्राविका) संथारा लेंगे ।  उस समय संवर्तक , महासंवर्तक नामक हवा चलेगी जिससे पर्वत ,बढ़, कोट,कुवे,बावड़ियाँ आदि सब नष्ट हो जायेंगे । केवल वैताढय पर्वत , गंगा नदी , सिंधु नदी ,ऋषभकूट, लवण की खाड़ी ये पॉच स्थान बचे रहेंगे । वे चार जीव समाधि परिणाम से काल करके प्रथम देवलोक मे जावेंगे । पॉचवे आरे के अंत मे जीव चार गति मे जाते है …….continued 


आपकी आभारी विमला मेहता 
लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना
🙏🙏
जय सच्चिदानंद
🙏🙏

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