कालचक्र भाग (आरा) – छ: # जिंदगी की किताब (पन्ना # 420)

6. छट्ठा आरा

दुषमा – दुषमा काल –

शास्त्रों के अनुसार छ: आरे होते है । पॉच आरों के बारे मे आपको जानकारी मिल चुकी है । अभी पॉचवां आरा चल रहा है । इक्कीस हज़ार वर्ष अवधि वाले पॉचवे आरे की समाप्ति के साथ ही दुख वाला छट्ठा आरा प्रारम्भ होता है । इसकी अवधि भी इक्कीस हज़ार साल होती है । यह आरा सबसे निकृष्ट और आदि से अंत तक कलह और अशांति , पाप और तापो से पूर्ण होता है । मनुष्य का देहमान क्रम से घटते घटते इस आरे मे एक हाथ का, आयुष्य बीस वर्ष का ,उतरते आरे मे अंत मे मूठ कम एक हाथ का व आयुष्य सोलह वर्ष रह जायेगा ।मनुष्यों की भाँति पशु पक्षी तथा वृक्ष आदि की आयु , ऊँचाई आदि भी पहले की अपेक्षा न्यून से न्यून होती जाती है । मनुष्यों के शरीर मे आठ पसलियाँ व उतरते आरे मे केवल चार पसलियॉ रह जायेगी । इस आरे मे छ: वर्ष की स्त्री गर्भ धारण करने लगेगी एवं कुत्ती के समान परिवार के साथ विचरण करेगी । 

इस आरे मे जो प्राणी बचे है वे रात दिन भूख प्यास से त्राहि त्राहि करते फिरते है । वे आठों पहर असहनीय दुख ,शौक, संताप , काम, क्रोध , लोभ , मोह ,मद, भ्रम, और बैरभाव की धधकती हुई आग मे तपते रहते है । विश्राम का नाम नही जानते है । पृथ्वी पर वनस्पति ,कृषि आदि समाप्त हो जाते है । सूर्य की गर्मी से पृथ्वी गर्म तवे की भॉति , दिन मे गर्मी का भयंकर प्रकोप , रात्रि मे प्राणलेवा ठंडक …ऐसे प्राणनाशक काल मे एक एक पल निकालते हुये वर्ष व्यतीत करते हुये अपनी आयु व्यतीत करते है । ये सूर्योदय व सूर्यास्त के समय पेट भरने की चिन्ता से अपनी गुफ़ाओं से बाहर निकलकर समीपस्थ नदियों के किनारे घूमते है । मछलियों के सहारे जीवन व्यापन करते है । इस आरे मे कामवासना तीव्र होने से इसे ही धर्म और कर्म मानते है । बडे से बड़ा पाप व घिनौना काम करने से भी नही चूकते है । कहने का मतलब उस आरे मे लोग जन्म से मरण तक घोरतम कष्ट और पाप भरा जीवन जीते है । 

जो मनुष्य दान ,ईश्वर आराधना नही करेगा,घोरतम पाप कार्य करने मे लिप्त रहेगा व प्रांयश्चित भी नही करेगा और उसे बार बार करने मे आनंदित होगा …  आदि ऐसे व्यक्ति इस आरे मे जन्म लेंगे ।

इस प्रकार अवसर्पिणी काल के छ: आरे का विवरण जैन शास्त्र मे मिलता है ।

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अवसर्पिणी काल की भॉति उत्सर्पिणी काल मे भी कर्म भोग से संबंधित छ: विभाग होते है । पर इस काल ( उत्सर्पिणी काल ) के प्रारम्भ मे उपस्थित कर्म भूमी की निकृष्ट अवस्था काल के प्रभाव से निरंतर उन्नति होने से – भोग भूमी उत्तम भोग भूमी मे बदल जाती है । इसे विकास की गति देने वाले चौदह मनु तथा 63 श्लाका पुरूष भी अवसर्पिणी की भॉति उत्पन्न होते है । 

हालाँकि उत्सर्पिणी काल का विकास क्रम अवसर्पिणी की अपेक्षा पूर्णत : विलोम गति वाला होता है । 

उत्सर्पिणी काल के प्रथम तीन काल खंड जैन ग्रंथों मे कर्मभूमि के नाम से प्रसिद्ध है । जैनों के अनुसार कर्म भूमी के प्रथम चरण दुषमा दुषमा या जघन्य कर्म भूमी के प्रथम सात सप्ताहों मे जल , दूध, अमृत, दिव्य जल वाले मेघ इस भूमी पर उत्तम वृष्टि करते है जिससे अवसर्पिणी काल के अंत मे हुई महावृष्टि का दुष्ट प्रभाव नष्ट हो जाता है और यह भूमि एक बार फिर से मनुष्य तथा पशु पक्षियो के साधारण कोटि के जीवन यापन के योग्य हो जाती है । पृथ्वी पर चारों और हरियाली , सुखद वायु  पाकर मनुष्य आमिषाहार व कलह आदि अवांछनिय कार्य न करने की प्रतिज्ञा लेते है । इस काल मे चौदह मनुओं होने की भविष्यवाणी की गई है । ये मनु एक हज़ार साल तक अथक प्रयास के द्वारा लोगो को आग जलाना , भोजन पकाना , वस्त्र धारण करना , विवाह संबंध स्थापित करना आदि कार्य सिखायेंगे । ये “मनु “सभ्यता के दूत होंगे ।इनके बाद चौबीस तीर्थंकर जन्म लेंगे व लोगो को परम पुरुषार्थ करने को प्रेरित करेंगे । कष्ट व झगड़े स्वयं खत्म हो जायेंगे । 

इस प्रकार यह संसार अनांदि अनंत है । न तो इसका किसी ने निर्माण किया है न ही कभी नष्ट होता है ।बस केवल इसकी पर्यायों मे परिवर्तन होता रहता है । 

इस प्रकार अवसर्पिणी व उत्सर्पिणी कालों का एक पूर्ण काल चक्र होता है जो क्रम से सदैव चलता रहता है । एक का अवसान दूसरे का प्रवर्तन करता है । एक मे मानव जीवन क्षीण तो दूसरे मे प्रगति की और बढ़ते हुये विकसित होता है । 


आपकी आभारी विमला मेहता 

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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