कालचक्र भाग (आरा) – चार # जिंदगी की किताब (पन्ना # 418)

4. चौथा आरा –
 दुषमा – सुषमा काल 

शास्त्रों के अनुसार छ: आरे होते है । तीन आरों के बारे मे आपको जानकारी मिल चुकी है। तीसरे आरे की ठीक समाप्ति के साथ ही चौथे आरे का आरम्भ होता है । इसमे दुख अधिक और सुख कम होता है । इसके प्रारम्भ मे मनुष्यों की अधिकतम ऊचॉई 525 धनुष, आयु आयु एक पूर्वकोटि तथा पृष्ठास्थो की संख्या 64 होती है । पुदगलो की उत्तमता हो जाती है ।मनुष्यों का देहमान 500 धनुष का रह जाता है । उतरते आरे सात हाथ का देहमान व 200 वर्ष से कुछ कम का आयुष्य रह जाता है । इस आरे मे कल्पवृक्ष कही भी नही दिखाई देता है ।इस युग ने मनुष्य भूख से सदैव त्रस्त रहते है । उन्हे बार बार खाने की आवश्यकता होती है । इस युग का मानव श्रमजीवी हो जाता है । भोजन अब साधारण फलो का हो जाता है । दुख ,शोक , रोग , संताप , भय ,मोह , लोभ ,जलन ,आदि मे पहले की अपेक्षा वृद्धि हो जाती है । लोगो मे भय और चोरी छिपे पापकर्म करने की प्रवृति जाग्रत हो जाती है ।विभिन्न प्रकार की कलाओं ,व विदधायो , की शोध भी इसी युग मे होती है ।दान देने की प्रवृति , स्वर्ग -नर्क की भावना भी लोगो के मन मे बलवती होती है । भगवान ऋषभदेव को छोड़कर सभी तीर्थंकर इसी आरे मे हुये ।

आगे पढिये पॉचवे आरे के की स्थिती के बारे मे जो अभी चल रहा है ….continued 


आपकी आभारी विमला मेहता

लिखने मे गलती मे क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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