कालचक्र भाग (आरा ) – दो # जिंदगी की किताब (पन्ना # 416)


पिछले लेख मे आपको कालचक्र की थोड़ी जानकारी दी ।आगे की जानकारी …

सुख और दुख दो अवस्थाये है । यह अवस्थाये निरंतर रूप से चलती है । इसे हम काल चक्र की संज्ञा भी दे सकते है ।

काल को दो भागो मे बॉटा गया है ….
1. व्यवहार काल
2. निश्चय काल
व्यवहार काल की सबसे बड़ी इकाई कल्प है व सबसे छोटी इकाई समय है । ऐसे असंख्य समय की एक आवलिका होती है ।आवलिकाओ का मुहूर्त होता है । तीस मुहूर्तों का एक दिन होता है ,पंद्रह दिनो का एक पक्ष होता है । दो पक्षों का एक मास होता है । बारह मासों का एक वर्ष होता है ।ऐसे ही असंख्य वर्षों का एक पल्योपम होता है ।
 काल चक्र को मुख्यत: दो भागो मे विभाजित किया गया है ।
1. उत्सर्पिणी काल

2. अवसर्पिणी काल

उत्सर्पिणी काल मे मनुष्य की दुख से सुख की और गति बढ़ती है तथा अवसर्पिणी काल मे यह गति उल्टी होकर सुख से दुख की और अपने क़दम बढ़ाती है ।

काल चक्र के इन कालों मे से प्रत्येक के तीसरे व चौथे आरे मे 24-24 तीर्थंकर भगवान होते है । इस समय कलयुग मे अवसर्पिणी काल का पॉचवां आरा चल रहा है । इसके पूर्व के तीसरे व चौथे आरे मे चौबीस तीर्थंकरों की परम्परा रही है । इस परम्परा मे अंतिम चौबीसवे तीर्थंकर भगवान महावीर हुये है ।

इन दोनो काल चक्रों को पुन: छ: भागो मे बॉटा गया है जो आरा कहलाता है ।

1. सुषमा-सुषमा

2. सुषमा

3.सुषमा-दुषमा

4. दुषमा-सुषमा

5. दुषमा

6. दुषमा – दुषमा

उत्सर्पिणी काल का क्रम अवसर्पिणी काल से ठीक विपरीत क्रम मे रहता है 

उत्सर्पिणी काल 

1. दुषमा – दुषमा

2.दुषमा 

3.दुषमा-सुषमा

4. सुषमा-दुषमा

5. सुषमा

6.सुषमा-सुषमा

इस प्रकार इन दोनो अवसर्पिणी काल व उत्सर्पिणी कालों का एक पूर्ण कालचक्र होता है जो क्रम से हमेशा चलता ही रहता है । एक मे मानव जीवन क्षीण होता जाता है तो दूसरे मे प्रगति की और बढ़ते हुये विकसित होता जाता है ।

इन दोनो काल के उपविभागो का संक्षेप मे विवरण इस प्रकार है …

1. पहला आरा – 

सुषमा – सुषमा काल

शास्त्रों के अनुसार छ: आरे होते है । यह पहला आरा एकांत सुख वाला प्रथम श्रेष्ठ आरा होता है ।इस आरे मे पृथ्वी सुंदर वृक्षों व वनस्पतियों से हरी भरी रहती है । अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्नों की खदानें पृथ्वी की शोभा मे अद्वितीय वृद्धि करती है ।चारों और निर्मल शीतल मंद सुगन्धित वायु का सतत प्रवाह बना रहता है । सभी प्रकार के द्रव्यों से पृथ्वी परिपूर्ण होती है ।इस समय किसी को भी विषय की लालसा नही रहती है ।चारों और सुख शांति का ही साम्राज्य दिखाई देता है । इस युग मे मानव का रंगरूप चटकीला होता है ,सुन्दर ,चिताकर्षक होते है ।इस समय रोग और व्याधि का नामोनिशान नही होता है । न राजा होता है ना जाति पाँति के झगड़े होते है और ना ही किसी भी प्रकार का भेदभाव होता है ।चींटी आदि क्षुद्र जन्तु भी नही होते है ।संतोषपूर्वक समताभाव मे रहना ही इस समय मानव का मुख्य स्वभाव होता है ।

वाणिज्य ,व्यापार व व्यवसाय की भी इस युग मे कोई आवश्यकता नही होती है । क्योकि इस युग मे मानव की समस्त प्रकार आवश्यकताओ की पूर्ति कल्पवृक्षों (दस प्रकार के ) से हो जाती है । संकल्प मात्र से ही मनोवांछित सामग्री प्राप्त हो जाती थी ।

इस काल मे मनुष्य जाति का विकास चरमसीमा पर होता है ।इस युग मे नर नारी छ हज़ार धनुष ऊँचे होते है ।उनकी रीढ़ की हड्डी मे 256 अस्थियॉ होती है । उनमे नौ हज़ार हाथियों के बराबर शक्ति पाई जाती ।

इस युग का मानव चिर युवा ,सुन्दर , सौम्य व मृदु स्वभाव वाला तथा स्वर्ण वर्णमाला होता है । विशाल शरीर वाला होते हुये भी स्वल्पहारी होता है । ऐसा कहा जाता है कि तीन दिन मे वह केवल एक बेर तुल्य फल ग्रहण करता है जो उसे कल्प वृक्षों से प्राप्त होता था । इस युग का मानव मलमूत्र रहित होता है ।

इस युग के जब माता पिता की आयु के पिछले छ:मास शेष रह जाते थे तब उस सौभाग्यवती स्त्री के कोख से पुत्र पुत्री का एक जोड़ा जन्म लेता है जिनका 49 दिन पालन करने के बाद वे एक युवा की भॉति समझदार हो जाते है व दम्पति बन सुख उपभोग का अनुभव करते हुये विचरते है । दम्पति का क्षणभर के लिये भी वियोग नही होता । मृत्यु के समय स्त्री को जँभाई व पुरूष को छींक आती है । मरकर वे देवगति को जाते है ।मृत्यु के बाद उनके शरीर को अग्नि संस्कार नही किया जाता । वह स्वयं ही विलुप्त हो जाते है । 4 शवों को जंगलों मे इधर उधर रख देना या क्षीर सागर मे प्रक्षेप कर देना ही एकमात्र अन्त्येष्ठि क्रिया इस आरे की मानी जाती है ।

इस समय मिट्टी का स्वाद भी मिश्री के समान मीठा होता था । इस आरे मे बैर नही , ईर्ष्या नही ,जरा नही ,रोग नही ,कुरूपता नही व  परिपूर्ण अंग , उपांग पाकर सुख भोगते है ।

इस आरे की समाप्ति पर ” सुषमा ” नामक दूसरा काल या आरा प्रारम्भ होता है ….continues…… 


आपकी आभारी विमला मेहता 

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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