लोभ # जिंदगी की किताब (पन्ना # 384)

🌸भूमिका के हिसाब से लोभ लालच सब मे होता है फर्क इतना है कि किसी मे ज्यादा होता है तो किसी मे कम होता है

🌸लेकिन लोभ करने का आधार सही होना चाहिये ।यदि कोई इंसान धन ,पैसे , गोरख धंधे की चाह मे लोभ करता है तो वह अशान्ति देता व इसके लिये पाप भी करवा सकता है

वही अच्छे कार्यो का लोभ हमे पाप से बचाता है

🌸इसलिये कहा गया है कि धर्म का लोभ करो , धन का नही

🌸पुण्य के फल का लोभ ना करो

पुण्य कार्य करने का लोभ करो

शुभ क्रिया करने का लोभ करो

🌸भोतिकता मे लोभ की सीमा होनी चाहिये ,यह जितनी बढ़ेगी उतनी ही अशान्ति देगी

वही आध्यात्मिकता या धार्मिकता का लोभ जितना बढ़ेगा उतनी जिन्दगी मे शान्ति का अनुभव होगा

🌸इसलिये कहा गया है कि लोभ जैसी बीमारी नही और संतोष जैसा सुख नही

🌸इच्छा पूरी नही होती है तो लोभ क्रोध बढता जाता है और

इच्छा पूरी होती है तो लोभ बढ़ता जाता है ।

लोभ जैसा कोई शत्रु नही


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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