रिश्ते # जिंदगी की किताब (पन्ना # 382)

रिश्तो मे सिक्के का एक पहलू ऐसा भी …..

सौम्या की शादी के कुछ साल पहले उसकी मॉ की मृत्यु किसी लंबी बीमारी से हो गई थी । मायके मे बापू व भाई भाभी की छोटी सी दुनिया थी ।उसके घर की अच्छी reputation होने की वजह से उसकी शादी अच्छे खाते पीते घर के पढ़ेलिखे लड़के रौनक के साथ हो गई ।

बचपन मे मॉ से मिले अच्छे संस्कारों के कारण वह मायके का मोह छोड़कर दिल से ससुराल वालों को अपना लिया व अपनी मॉ व बहन ना होने से सास को मॉ की छवि मे व ननद को बहन की छवि मे देखती ।

जब वह शादी करके ससुराल आई तो उसकी सासू मॉ ने कहा ! देखो सौम्या हमारे यहॉ बहू व बेटी मे कोई फर्क नही समझा जाता । मेरी एक बेटी ससुराल गई तो तुम दूसरी बेटी बनकर इस घर मे आ गई हो।

सौम्या बहुत खुश हो कर बोली कि मम्मीजी मै बहुत ख़ुशक़िस्मत हूँ कि आप ने मुझे बेटी का मान दिया । मै भी आपको अपनी मां की तरह समझूँगी ।

फिर कुछ रस्मों रिवाज के बाद एक सप्ताह के लिये हनीमून पर चली गई । वापस आने के बाद मम्मी जी बोली कि बेटी आज तुम आराम कर लो।

ठीक है मॉ ।

सौम्या बहुत ही प्रसन्न थी व अपनी क़िस्मत पर नाज कर रही थी कि उसे इतनी अच्छी सास मिली है ।

दूसरे दिन सास ने सौम्या को कहा कि आओ बेटा मेरे पास बैठो , तुम्हे इस घर के काम काज के बारे मे थोड़ा बता दूँ ।

बेटी कल सुबह छ: बजे उठ कर मटके के साथ बाल्टियॉ व टब मे पानी भर लेना क्योकि यही पानी आने का समय है । बाद मे सबके लिए सुबह की चाय व कॉफी बना देना व नाश्ते मे पराँठे के साथ ज्यूस निकाल देना व और हॉ अपनी पसंद की भी एक और चीज बना देना , बस ज्यादा तकलीफ नही करना ,ये बहुत है ।

मालूम है ना बेटी आजकल कामवाली कितना गंदा काम करती है , सुबह तो वह झाड़ू पोछा कर देगी लेकिन एक बार शाम को फिर से झाड़ू लगा लेना । अब मेरी बेटी के होते हुये क्यूँ टेंशन करूँ । तू तो मेरी प्यारी बेटी है ।

नाश्ते के बाद घर को झाड़ पोंछ कर नहा लेना व उसके बाद सबके लिए लंच बनाकर सबको खिला देना। बाद मे किचन साफ करना व बर्तन धोकर शाम के लिये खाने की तैयारी करके आराम से लेट जाना आख़िर मेरी बेटी थक गई होगी ना ।

फिर पॉच बजे उठकर शाम को चाय के साथ कुछ भी हल्का फुल्का स्नैक्स बना देना व पूरे घर का झाड़ू लगा देना ।डिनर तु ही तय करेगी । बस मेरे व बापूजी को सब्जी रोटी पसंद है , लला को सब्जी रोटी पसंद नही है इसलिये अपनी पसंद से कोई भी खाने की डिस्क बना देना । तु तो इस घर की मालकिन है ,तुझे सारे काम की ज़िम्मेदारी सौंपती हूँ । दिन मे एक बार तुम अपनी ननद काजल से भी उसके हालचाल पूछ लेना ।

मुझे मालूम है नई नई शादी हुई है ,तुम्हारा भी लल्ला के साथ घूमने का मन करता होगा इसलिये बस इतना ही काम करना है । बाक़ी तुम आराम से लल्ला के साथ घूमो फिरो , तुम्हे कोई बंदिश नही ।

सौम्या सबका दिल जीतने के लिये उनके कहे अनुसार सारा कार्य कर देती । सात साल दो बच्चो की मॉ बनने के साथ कैसे गुज़रे पता ही नही चला । इसके बाद उसके पति रौनक की नौकरी दूसरे शहर मे लग गई और वह बच्चो सहित वहॉ आ गई ।

पति के ऑफिस व बच्चो के स्कूल जाने बाद हर दो दिन मे वह अपनी ननद या सास से बात कर लेती और अपनी दिनचर्या के साथ बच्चो, पति के हालचाल व और भी दूसरी सारी बातें करती ।

आज बच्चो को स्कूल बस मे छोड़ने गई तो जल्दी के चक्कर मे सीढ़ियों से गिर गई व रीढ़ की हड्डी पर ज़ोर लगने से दर्द के साथ तेज़ बुखार आ गया व पूरा शरीर सूजन से भर गया । वह चलने फिरने की स्थिति मे भी नही थी । डॉ को बताया व दवाइयाँ दी गई । रह रहकर दर्द से कराह उठती । इस कारण वह अपनी सास व ननद को फ़ोन नही कर पाई ।

एक सप्ताह बाद आज सौम्या ने थोड़ा ठीक लगने पर मम्मीजी को फ़ोन लगाया ,उस समय काजल भी वहॉ थी । वह कुछ बोलती उसके पहले ही उसकी सास व काजल ने बोलना शुरू कर दिया कि लला तो नौकरी मे व्यस्त रहता है इसलिये तुम्हारी ज़िम्मेदारी बनती है कि समय पर फ़ोन कर दिया करो । तुम कितनी ग़ैर ज़िम्मेदार हो , इतने दिन तुमको एक फोन करने का भी समय नही मिला … व अपनी तकलीफ़े बतानी शुरू कर दी ।

जब उसने अपनी हालत बताई तो उसे हाल चाल पूछना तो दूर बल्कि ये बोलना कि हमारे भी शारीरिक तकलीफे चलती रहती है ,चाहे तो तुम लेटे लेटे भी फ़ोन पर बात कर सकती थी । इस तरह की तो बाते जिंदगी मे चलती रहती है ।

यह सुनकर सौम्या के ऑसू निकल गये ।

आज उसे लगा कि अपनी मॉ व सास मे कितना फर्क है वह तो मॉ समझकर उन्हें फ़ोन लगाती पर उन्होंने बेटी समझकर कभी तकलीफ़ महसूस नही की ।

सौम्या एकदम असहज हो गई । थोडी देर बाद मे वह कुछ सहज होकर अपनी सास से बोली कि मम्मीजी ! आपने मुझे बेटी कह कहकर पुकारा , आपकी बहुत मेहरबानी है ….. पर अब मै चाहती हूँ कि मै बहू ही बनकर रहूँ , मुझे बेटी नही बनना और सौम्या ने फ़ोन रख दिया ।

प्रायः हर घर मे बहू या भाभी से हर प्रकार की उम्मीद रखी जाती है पर उसके प्रति भी उनका कुछ कर्तव्य होता है वह भूल जाते है ।

दोस्तो मॉ शब्द ही ममता का सागर होता है फिर कोई मॉ होकर भला बहू के साथ ऐसा क्यो करती है ।ऐसा क्यो होता है कि एक नारी जो स्वयं के बच्चों की तो मॉ बन जाती है पर बहू की मॉ बनकर व्यवहार करना रास नही आता ।

रिश्ते दोनो तरफ़ से निभाया जाया तो रिश्ता मधुर रहता है । हमेशा बहू या भाभी से ही फ़ोन की उम्मीद करना गलत है ।

यदि बेटा और बहू दोनो की गलती होती है तों भी यह कहकर कि मेरा बेटा तो ऐसा नही है ,जरूर बहू के कहने मे आकर किया है और सारा इल्ज़ाम बहू पर मढ दिया जाता है ।

बेटी समझना और बेटी होना दोनो मे काफ़ी फर्क है । बहू को ही सारा दोष देना भी तो वाजिब नही है । बहू को कहने मे तो बेटी बोलते है पर क्या वाकई मे उसे अपनी बेटी की तरह उसको मान देते है ?

जरूरत है बहू व बेटी के प्रति बनाई धारणाये बदलने की ….


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

picture taken from google

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