मृत्युभोज के नाम एक संदेश # जिंदगी की किताब (पन्ना # 364)

🔸जिस घर मे पुत्र शोक पर क्रंदन कर रहे मॉ पिता

वहॉ भोजन का निवाला तुम्हे कैसे भाता होगा ?

🔸जिस घर मे सूनी मॉग लिये रोती बिलखती विधवा युवती

वहॉ बडे चाव से पंगत खाते हुये तुम्हे ज़रा भी पीड़ा नही होती ?

🔸जिस घर मे रक्षा सूत्र लिये बहना अपने भाई की याद मे तड़पती

वहॉ रस लेकर खाते हुये तुम्हारा दिल नही भर आता ?

🔸जिस घर मे कोई भी व्यक्ति बन गया हो काल का ग्रास

वहॉ भोजन निवाला लेते समय दिल मे नही होता है त्रास ?

🔸शोकाकुल परिवार के प्रति अपना सदव्यवहार निभाओ

धर्म यही सिखलाता है मित्रो मृत्युभोज को ना खाओ

🔸चला गया जिस परिवार के अंग का कोई हिस्सा

उस परिवार के लिये ये वज्रपात से क्या कम है

🔸परंपरा की चक्की मे पीसकर जैसे तैसे परिजन को तेरहवीं खिलाते

अंधी परंपरा के पीछे मन मे ऑसू लिये जीते जी मर जाते

🔸आओ सब मिलकर इस कुरीती को जड़ से दूर करे

सांत्वना देने जाये ज़रूर पर मृत्युभोज को नही खाये


इस संदेश का आशय किसी को दुख नही पहुचॉना है ,


अगर किसी को दुख पहुँचा हो तो क्षमायाचना 🙏🙏


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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