मानवता # जिंदगी की किताब (पन्ना #361)

बदलते वक्त मे

बदल गई इंसान की सोच

मानवीय भावनाओ मे आ गई खोट ।

यूँ तो कहलाते है

हम आर्यों की संतान

पर ढूँढने से भी ना मिले

इंसान की हैवानियत का भंडार ।

हम इंसानो की भूखी हवस से

जानवर तो क्या

इंसान भी कहॉ बच पाते है ।

कैसे इंसान है जो खुद

इंसानियत का सौदा करते है ।

सोचो इन सबका

क्या होगा अंजाम ?

ऐसी भूखी हवस की हिंसा से

देश सदियों तक रोयेगा

नाम ले लेकर अहिंसा का ।

कहते है सर्प का विष

बहुत ज़हरीला होता है ।

लेकिन इंसानो ने

सर्पो को भी पीछे छोड दिया है ।

भला इंसानो से ज्यादा

ज़हरीला कौन कहलायेगा ?

बुराई से लिपट कर इंसान

हो गये उसके ओत प्रोत

और बन गये हिंसा के दोस्त

अहिंसा को बेकार मे यूँ ही

कर दिया बदनाम ।

सोचो ऐसे इंसानो से बुरा और कौन होगा ?इस देश का क्या अंजाम होगा ?


आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना

🙏🙏जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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