परिवार “मै” से नही हम से बनता है # जिंदगी की किताब (पन्ना # 342)

वीनू फ़ोन पर अचानक बचपन की सहेली मुक्ता की आवाज सुनकर चौक गयी । फ़ोन पर बताया कि वह शहर मे कुछ काम से आ रही है और प्यारी सखी के साथ रहेगी ।सुनकर वीनू खुशी से झूम उठी और पुराने दिनों मे चली गई । बचपन की सहेलियों से मिले हुये व बात किये कितना अरसा बीत गया ,घर परिवार की ज़िम्मेदारियॉ के बीच पता ही नही चला ।

उसके लिये खानापीने , बाहर घूमाने आदि की तैयारी मे जुट गई व बेसब्री से इंतज़ार करने लगी ।

आख़िरकार वह घड़ी आ ही गई । वीनू अपनी सहेली मुक्ता को एयरपोर्ट से लेकर घर आ गई ।

दूसरे दिन मुक्ता के साथ बाज़ार गई व घूमते घूमते काफी सामान ,ढेरों सब्ज़ियों व फल आदि खरीद लिये क्योंकि रोज बाज़ार जाना उसे समय की बर्बादी लगता ।

मुक्ता बोली वीनू तूनें इतनी सारी हरी सब्जियां व फल एक साथ क्यो ले ली । अब तुझे कितना समय लगेगा इनको साफ करने । वीनू ने हँसते हुये कहा कि क्या हुआ मुझे ज़रा भी चिन्ता नही है । ऐसे ही बात करते करते दोनो घर पहुँच गये ।

घर पहुँचते ही वीनू की छोटी बेटी रानी आई और बोली कि मम्मा आप व ऑटी आराम से बैठिये । तुरंत दो गिलास पानी भरकर उन्हें पकड़ाते हुये कहा कि आप दोनो थक गये होंगे , मै गर्मागर्म चाय व पकौड़ी लेकर आती हूँ । थोड़ी देर बाद एक ट्रे मे चाय के साथ पकौडी ले आई । दूसरी तरफ बेटे यश ने बाज़ार का सामान ले जाकर रसोई मे रख दिया । बड़ी बेटी ज्योति अपने कमरे मे थी ,उसे कुछ ऑफिस का कुछ कार्य करना था।

डिनर सभी ने मिलकर किया ,बाद मे टीवी पर फ़िल्म देखने घर के सभी लोग बैठ गयें क्योंकि शनिवार का दिन था । पिक्चर देखते देखते सबने मिलकर हरी सब्जियां साफ कर दीं। बातों का दौर भी चलता रहा ,सबने आपस में दिन कैसा बीता ,वो एक दूसरे को बताया । यश ने स्कूल की बातें बताई, ज्योति ने अपनी मित्रो की, रानी ने अपने कॉलेज की ,वीनू ने अपने पति अमर को घर की बातें बताई तो अमर ने ऑफिस की ।

मुक्ता ये सब देखकर दंग रह गई व ख़्यालों मे चली गई क्यों कि उसके घर में ये सब नहीं होता है ,वो अकेली ही खपती रहती है | यूं तो नौकरानी आती है ,पर बाकी के छोटे छोटे कितने काम होते हैं । उसे याद नहीं कि कभी बच्चों ने मदद तो दूर उसे एक गिलास पानी भी पिलाया हो ।टीवी , मोबाइल , कम्प्यूटर में बच्चे घंटों बर्बाद कर देते हैं,पर उसकी जरा भी मदद नहीं करते । उसका अपना पति भी तो टीवी,मोबाइल , मित्रों के साथ गपशप आदि में डूबा रहता | परिवार मे किसी को एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिये वक्त नही होता ।

अचानक मुक्ता ख़्यालों से निकलकर वीनू से पूछ बैठी कि ये सब तूने कैसे किया । देख मुक्ता मैंने व अमर ने बच्चों को पूरा वक्त दिया ,उन्हें अच्छी आदतें सिखाई, अपना काम खुद करना सिखाया । सुबह स्कूल कॉलेज , ऑफिस जाते समय अपना बिस्तर ठीक करना , टॉवेल सुखने के लिये डालना , ओढ़ने की चादर या रजाई समेट कर रखना ,अपना कोई भी सामान सही जगह रखना ,पढ़ाई के बाद किताबें फिर से जगह पर रखना ……। स्कूल,कॉलेज से आते ही कपडे इधर उधर ना रखकर , अलमारी में रखना , अपने जूते मौजे सही जगह रखना । लंच बॉक्स ,बोतल रसोई सिंक में रखना । खाना खाकर अपने बर्तन खुद उठाकर रखना ।रात को ब्रश करके सोना । पढ़ाई भी करें पर साथ मे मम्मी पापा की हर संभव मदद करें । मेरे घर में बेटा, बेटी दोनों काम करते हैं।मै बेटे को भी अपनी बेटी की तरह घर के छोटे मोटे काम करना सिखाती हूँ व बेटी को भी बेटे की तरह बाहर के कार्य मे संलग्न रखती हूँ ।

मुक्ताघर सबका है ,सबकी जिम्मेदारी है कि उसे साफ सुथरा रखें । अमर भी हर संभव मदद करते हैं । घरेलू औरत को भी अपने लिए वक्त चाहिए। गृहिणी होने का ये मतलब नहीं कि वो दिन भर अकेली ही खपती रहें ,अपने को वक्त नहीं दें ।

देख मुक्ता मुझे तो बस इतना समझ आता है कि परिवार “मै “ से नही “हम “ से बनता है जहॉ हर कार्य प्यार से ,प्रेम से मिलकर किया जाता है ।सभी दुख या सुख एक साथ मिलकर बॉटा जाता है ।

घर के हर सदस्य को अपना काम खुद करके सहयोग करना चाहिए। बच्चों में ये आदत होगी तो वो भी आगे जाकर किसी पर निर्भर नहीं रहेंगे।यह हर घर के लिए अच्छा होगा।अगर घर की गृहिणी खुश रहेंगी तो घर में भी खुशहाली बढ़ेगी ।

वीनू तू एकदम ठीक कह रही है । मै भी अपने बच्चों को प्यार से सब काम अपने आप करने के लिये प्रोत्साहित करूँगी । घर की ज़रूरियात काम के साथ सबके साथ दिनभर की अपनी बाते व उनकी बातों के साथ एक नया दौर शुरू करने का प्रयत्न करूँगी क्योंकि अब समझ मे आ गया कि ख़ुशहाल परिवार “मै “ से नही “हम “से बनता है ।


आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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