पैसा हाय पैसा # जिंदगी की किताब (पन्ना # 333)

पैसा हाय पैसा ……

आज हर व्यक्ति को सुख चाहिये , सुख चाहना ग़लत नही है पर पैसो से ही उसे सारा सुख मिल जायेगा ,ये जरूरी नही है ……

अमेरिका मे एक बड़ा अरबपति बिजनेसमेन जिसका नाम एड्रेस कार्नेगी था , जब वह मरणासन्न की स्थिति मे था तो उसने अपने सेक्रेटरी को बुलाया और बोला कि एक बात बताना जो काफी समय से तुमसे पूछना चाह रहा था ,उसका सच सच जवाब देना ! अगर अंत समय मे भगवान तुमसे पूछे कि तु कार्नेगी बनना चाहेगा या सेक्रेटरी तो तुम क्या जनाब दोगे ? सेक्रेटरी ने तुरंत जवाब दिया कि मै तो सेक्रेटरी बनना चाहूँगा । कार्नेगो बोला – क्यो ? तो वह बोला कि साहब मै आपको चालीस साल से देख रहा हूँ ,ऑफिस खुलते ही आप सबसे पहले आते हो और सबसे बाद मे जाते हो । आपने जितना इकट्ठा किया उससे अधिक पाने के लिये हमेशा चिन्तित रहते हो । ठीक से खा नही सकते ।रात को सो नही सकते ।मै तो स्वयं आपसे पूछने वाला था कि आप दौड़े तो बहुत लेकिन पहुँचे कहॉ ? आपकी लालसा , चिंता और संताप को देखकर हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि हे ईश्वर तेरी कृपा है कि तुमने मुझे एड्रेस कार्नेगी नही बनाया ।

एड्रेस कार्नेगी ने सेक्रेटरी को कहा कि मै चाहता हूँ कि मेरे मरने के बाद तुम अपना निष्कर्ष सारी दुनिया मे प्रचारित कर दो । तुम सही कहते हो कि मै धन कुबेर हूँ लेकिन काम से कभी फुर्सत ही नही पाई । बच्चों को समय नही दिया , पत्नी से अपरिचित रह गया । मित्रों को दूर ही रखा । अपना औघोगिक साम्राज्य को “बढ़ाने और बढ़ाने “ के चक्कर मे हमेशा चिन्तित रहा । अब लग रहा है कि ये दौड़ व्यर्थ थी , क्योंकि मेरा सेक्रेटरी भी आज एड्रेस कार्नेगी नही बनना चाहता है । कल ही मुझसे किसी ने पूछा कि क्या तुम तृप्त होकर मर पाओगे ? तो मैंने जवाब दिया था कि तृप्ति कैसी ? मै मात्र दस अरब छोड़कर मर रहा हूँ , सौ अरब की आकाँक्षा थी जो अधूरी रह गई ।

इसको पढ़कर हम ये नही बोल सकते कि पैसा बेकार है । जिन्दगी जीने के लिये पैसा बहुत जरूरी है । पर पैसो के पीछे इस कदर पूरी जिन्दगी भागना कि हम अपनी जिन्दगी भी जीना भूल जाये तो गलत है । ये कलयुग की माया है कि आज इस जगत मे हाय पैसा , हाय पैसा की धूम मची है ।यहॉ रिश्तो से भी ज्यादा पैसों की अहमियत है ,इंसान इसे सबसे बड़ा दोस्त समझता है और ये धारणा बना लेता है कि पैसा ही सब कुछ है । यदि पैसा ही सब कुछ होता तो पैसा वाला हर इंसान सुखी होता , ख़ुश व आनंद मे रहता ,स्वस्थ होता ।लेकिन फिर भी वो सुखी नही । तो इंसान क्यूँ सारी उम्र पैसों के पीछे भागता है ,दूसरों को देखकर मुँह मोड़ लेता है , रिश्ते नाते भूल जाता है । दीन दुखियों के आँखों मे ऑसू देखकर भी दिल नही पसीजता ।

भौतिक सुखों की तीव्र इच्छाये उसे पैसो के पीछे भगा रही है और आधुनिकता से अत्यानुधिकता की और निरंतर दौड़ा रही है । प्राकृतिक व आंतरिक सुखों को खोकर वह आर्टिफिशियल व मशीनरी सुखों से सुख पाना चाहता है ।

इंसान पैसों की दौड़ मे प्रभु को भी भूल जाता है । वह भूल जाता है कि भक्ति जगतनारायण की करनी चाहिये ना कि नगद नारायण की । वह जब तक पैसों की मोहमाया की भूलभुलैया मे भटकता रहेगा , उसे दुखो से मुक्ति नही मिलेगी ।पैसा सुखासन का साधन है पर सुख नही है ।

असली सुख दूसरों को सुख देने मे मिलता है , प्रभु भक्ति मे मिलता है ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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4 Comments Add yours

  1. जय सच्चिदानंद

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  2. Madhusudan says:

    Rawan jaise anginat udahran bhare pade hain jiski daulat aur shakti itni ki dharti hilti thi…..magar kaha hai wah……prem aur bhakti ke alawa koyee aur rasta shanti ka nahi……..bahut khub.

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