दिखावे की मानसिकता # जिंदगी की किताब (पन्ना # 320)

दिखावे की मानसिकता

सुनंदा सुबह से भागदौड़ कर रही थी ,क्योंकि उसकी बेटी की शादी आज से ठीक दस दिन बाद होने वाली थी । वह विवाह की ढेर सारी तैयारी करने मे जुट गयी । घर मे रोज के काम के लिये कामवाली थी पर ऐसे अवसर पर एक कामवाली से पूरा काम होना वश की बात नही थी सो उसने एक दूसरी कामवाली को शादी होने तक पूरे दिन भर के काम के लिये बुलाया ताकि भाव तय कर सके ।

सुनंदा ने पूछा ,अच्छा कमली बताओ तुम पूरे दिन का कितना रूपये लोगी ।सुबह आठ बजे से रात को ग्यारह बजे तक ।कोई भी छोटा मोटा काम करना है । और हॉ ज़रा सी काम मे ढिलाई की तो पैसे काट दूँगी ।

कमली बोली -मालिकन पूरे दिन के आठ सौ रूपये बनते है ।

क्या कहा आठ सौ रूपये ? तुम्हारा दिमाग तो सही है ना ? ऑंखें तरेरकर सुनंदा बोली । मालकिन पूरे दिन भर का काम है । मैं तो कम मॉग रही हूँ वरना और कामवाली हजार लेती है ।

देख कमली ! मुझे बताने की जरूरत नही है ,कौन कितना लेता है । मैं इतना अधिक तो नही दूँगी । अगर तुझे सात सौ मे करना है तो रूक ,वरना चलती बन ।

मालकिन ! मुझे काम की बहुत जरूरत है क्योंकि मेरा बेटा काफी बीमार है ।उसके लिये दवाई, फल बहुत जरूरी है , मेरे पास पैसे नही है । कुछ तो रहम करो ।

सुनंदा के चेहरे पर आक्रोश आ गया और बोली देख कमली ! मेरे ढेर सारे काम है , वक्त को बर्बाद मत कर , सात सौ मे करना है तो अभी से काम पर लग जा वरना चली बन ।मैं दूसरे का इंतजाम करती हूँ ।

मरती क्या ना करती । बीमार बेटे की चिंता सताये जा रही थी सो बोली मालकिन ठीक है , अभी से मैं काम पर लग जाती हूँ ।

एक सप्ताह बाद अंगूठी पहनाने के फंक्शन की तैयारी शुरू हो गयी । फंक्शन के दिन उस शहर व दूसरे शहर से काफी सगे संबंधी व नजदीकी रिश्तेदार आने लग गये ।

अंगूठी पहनाने के कार्यक्रम मे संबंधियों के मनोरंजन के लिये स्टेज पर नाच गाने का इंतज़ाम किया गया । वही दूसरी और संबंधियों के वेलकम के लिये भांगड़े के लिये किराये के आदमी बुलाये गये । चारों और रौनक़ ही रौनक़ हो रही थी । कमली दौड़ दौड़ कर काम कर रही थी । हर थोड़ी देर बाद कमली ये लाना तो , ज़रा यहॉ से सामान ठीक जगह रख देना …. । कमली पूरी ताक़त से काम कर रही थी ताकि किसी को शिकायत का मौका ना मिले । सोच रही थी जल्दी से जल्दी दिन पूरा हो और रूपये मिले ताकि बेटे के लिये दवा व फल खरीद सके । उधर तेज तेज ढोल नगाड़े बजने शुरू हो गये ।थोड़ी देर बाद वर वधू का आगमन होने वाला था । जैसे ही आगमन हुऑ सभी रिश्तेदार नाचने लगे ,भॉगडा होने लगा ।वर , वधू के मॉ पिता व अन्य रिश्तेदार खुशी मे नाचने वाले पर रूपये घुमा घुमाकर ढोलक वाले को दे रहे थे ताकि उन्हें कंजूस ना बोले व समाज मे नाम हो कि बच्चों की खुशी मे कितने रूपये लुटाये ।जैसे ही वर वधू ने नाचना शुरू किया तो पिता ने पूरी रूपयों की गड्डी वर वधू के सिर पर घुमाकर ढोलक वाले को दे दी । ऐसे लग रहा था हर थाप पर रूपयों का बरसात हो रही है । बाद मे स्टेज पर अंगूठी का कार्यक्रम सम्पन्न हुऑ और सभी लोग भोजन करने लगे । खाने मे इतनी वैरायटी थी कि यदि उन सबको एक बार भी चखे तोपेट भर जाये । लोग प्लेट मे भरकर खाना ले जा रहे थे ताकि दूसरी बार आना ना पड़े ,जिसमे से काफी हिस्सा झूठा छोड़ा जाता ।जाते समय सभी को उपहार दिया गया ताकि समाज मे उनके नाम का रूतबा बढ़े ।

दूसरी और बेचारी कमली बच्चे की चिन्ता मे मर मरकर काम कर रही थी । उसके लिये एक एक रूपया कीमती था । तभी तो सौ रूपये कम मे भी काम करने को राज़ी हो गई ।वही दूसरी और लोगों मे अपना नाम कमाने के लिये हर बात मे रूपये की बारिश ।

ये कैसी दिखावे की मानसिकता है ,जहॉ ज़रूरतमंद गरीब कमली को सौ रूपये ज्यादा देने मे आनाकानी ,वही दूसरी और सगे संबंधियों समाज मे नाम कमाने के लिये हजारो लाखों रूपयों की बौछार वो भी कुछ देर के लिये …..

क्या आपको लगता है ऐसा करना सही है ?

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

picture taken from google

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