संस्कार # जिंदगी की किताब (पन्ना # 319)

आज की भोगवादी संस्कृति ने उपभोगवाद को जिस तरह से बढ़ावा दिया है ,उससे बाहरी चमक दमक से ही इंसान को पहचाना जाता है जिसका परिणाम अच्छा नही है ।

वास्तव मे इंसान की पहचान संस्कारों से बनती है जो हमारे जीवन की शक्ति है । संस्कार उसके पूरे जीवन को दर्शाते है । उच्च संस्कार के आगे धन दौलत का कुछ भी मूल्य नही है । यह एक ऐसा धन है जो मानव को महामानव बनाता है व व्यक्ति को इज्जत से जीना सिखाता है ।

भारत मे एक समय ऐसा हुआ करता था जब संस्कारों मे चरित्र को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था ।

एक बार विश्वधर्म सभा मे स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका गये हुये थे । वहॉ उनके कपड़ों को देखकर कुछ अमेरिकी महिलाओं ने उन पर व्यंग्य किया । स्वामी जी बहुत शान्ति के साथ उनकी बातों को सुनते हुये बोले कि , बहनों आप उस देश मे रहती है जहॉ आदमी की कीमत कपड़ों से ऑकी जाती है , पर मैं एक ऐसे देश से आया हूँ जहॉ आदमी की कीमत उसके कपड़ों से नही बल्कि उसके चरित्र से होती है ।

आज इंसानों ने पूरे संसार को एक बाजार बना दिया है । यहॉ तक कि स्त्रियों को भी नही छोड़ा है । हालाँकि ऐसी महिलाओं की कमी नही जिन्होंने नारी के गौरव को बढ़ाया है , अपनी कुशलता से हर क्षैत्र मे सफलता के झंडे फहराये है ।

मॉ बाप को बचपन से ही बच्चों को शिक्षित करने के साथ अच्छी बातों के भी संस्कार देने की प्राथमिकता देनी चाहिये । जो बहुत आवश्यक है क्योंकि बच्चे कच्चे घड़े के समान होते है उन्हें जैसे आकार मे ढालेंगे वे उसी आकार मे ढल जायेंगे । बच्चों को संस्कारवान बनाने से पहले बहुत जरूरी है कि माता पिता संस्कारवान बने , तभी बच्चे संस्कारवान व चरित्रवान बनकर घर की, परिवार की इज्जत को बढ़ा सकेंगे ।

संस्कार निरंतर जलने वाली एक दीपशिखा है जो जीवन के अंधेरे मोड़ो पर भी प्रकाश की किरणें बिछा देती है । संस्कारों की कमी से आज के ज़माने मे सहनशीलता की बहुत कमी होती जा रही है । सहन करना आता ही नही चाहे कोई भी रिश्ता हो ।

सबसे पहले घर परिवार मे एक सीमा तक सहन करने की शक्ति होनी चाहिये , तभी छोटी छोटी बातों को लेकर मनमुटाव व रोज के झगड़े नही होंगे । एक व्यक्ति अपने परिवार के सदस्य को सहन नही करता लेकिन मित्र संबंधियों को सहन कर लेता है । यह बड़ी विचित्रता है ।

हमे अक्षर ज्ञान से ज्यादा जीवन और चरित्र बनाने वाली बातो पर ज्यादा ध्यान देना चाहिये क्योकि अक्षर ज्ञान हमे आर्थिकता का लाभ तो दे सकती है लेकिन ज्ञान व संस्कार का नही ।

जो व्यवहार मे बड़प्पन ,किसी के द्वारा बुरा बर्ताव करने पर भी उसके प्रति खराब भावना ना लाना , कैसी भी आई मुश्किलों का सामना करना ,जो अच्छे बुरे की पहचान कर सके …..और भी अनेक बाते है जो सही मायने मे व्यक्ति को संस्कारित करती है ,वे ही सही अर्थ मे शिक्षित है

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    खूबसूरत विचार।👌👌

    Liked by 1 person

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