चिन्ता # जिंदगी की किताब (पन्ना # 314)

आजकल हर इंसान कुछ ना कुछ चिन्ता से पीड़ित है ,किसी को अपने परीक्षा के परिणाम की चिन्ता , किसी को बच्चों की शादी की , ग़रीबों को रोटी की चिंता , बेरोज़गार को रोजगार की चिन्ता ,सत्ताधारी को अपनी सता की चिन्ता,किसी को उधार दिये पैसे की चिन्ता ….. ऐसे ही कितनी अनगिनत बातों की चिन्ता जो किसी न किसी रूप मे आज सर्वव्यापक है ।यदि हम गहराई से चिन्ता का कारण सोचे तो महसूस होगा कि इंसान चिन्ता किसी प्रकार की हानि या अशुभ, अनिष्ट अथवा इच्छा के विरूद्ध होने की आशंका से करता है ।जैसे कि मॉ बाप बेटी की शादी को लेकर सोचते है कि यदि उसकी सही उम्र मे शादी ना हुई तो बाद मे अच्छे लड़के के लिये बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ेगा ।

इस तरह किसी भी प्रकार की चिन्ता करने से सूक्ष्म मानसिक प्रकम्पन या विचार तरंगें उत्पन्न होती है । जो वातावरण को अथवा उस मनुष्य के मन को बिगाड़कर प्राय: वही परिणाम उत्पन्न कर देती है जो कि चिन्ता वाला मनुष्य शुभ एवं हितकर नही मानता । मनुष्य जब शंका करता है तो उसका कर्म फल भी हिल जाता है ।

अशुभ की चिन्ता या चिन्तन से अशुभ परिणाम होने की संभावना बढ़ जाती है ।अत: इंसान को चाहिये कभी भी अशुभ, अमंगल , अनिष्ट, अहित या हानि की चिन्ता न करे बल्कि अपना तथा दूसरों का शुभचिन्तक बना रहे ।चिन्तन करे पर शुभ चिंतन करे ।

यदि हम भविष्य की चिन्ता मे लग जायेंगे तो वर्तमान का अवसर या समय हमारे हाथ से निकल जायेगा । अत: हमे चिंता छोडकर वर्तमान मे जो भी चांस मिला है उस पर पुरुषार्थ करते रहना चाहिये ।

चिन्ता करना दूरदर्शिता नही है बल्कि दुखदर्शिता है इंसान को सोच विचार तो करना चाहिये पर चिन्ता की चक्की मे ना पिसना चाहिये ।

चिन्तन तो करना चाहिये परंतु चिन्ता की चिंगारी मे अपने को झुलसाना नही चाहिये ।

चिन्ता करने से भी क्या फायदा होगा ? यदि चिन्ता करने से परिणाम मे हेरफेर नही होता है तो स्पष्ट है कि उसने चिन्ता कर करके स्वयं को व्यर्थ ही कष्ट दिया। इससे स्मृति दुर्बल होती है ,विवेक मंद हो जाता है , निर्णय शक्ति ठीक प्रकार से कार्य नही करती व पूरी तन्मयता से पुरुषार्थ नही कर पाता व कार्य बिगड़ जाता है ।

एक कहावत है कि संकल्प से सृष्टि बनती है । अत: चिन्ता करने वाला इंसान उल्टा सोच सोचकर उल्टा ही काम कर बैठता है व उल्टा ही परिणाम बनकर उसके सामने आ जाता है । वह अपने संकल्पों से वातावरण मे खराब स्पंदन द्वारा बुरा परिणाम ले आता है ।

इसलिये मनुष्य को निश्चित होकर पूरे मन से बिना चिन्ता किये कार्य करने से सफलता प्राप्त होगी जिन्दगी मे उतार चढ़ाव तो आते ही रहेंगे । सूरज का भी दिन भर की अवस्थाओ मे परिवर्तन होता है । अत: दिन तो बदलते रहेंगे , घबराने या चिन्ता करने की बजाय सदा प्रभु स्मरण व आनंद मे रहकर अपना पुरुषार्थ करते रहना चाहिये ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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10 Comments Add yours

  1. Raj says:

    bahut hi upyogi

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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  2. Madhusudan says:

    चिन्ता करना दूरदर्शिता नही है बल्कि दुखदर्शिता है । इंसान को सोच विचार तो करना चाहिये पर चिन्ता की चक्की मे ना पिसना चाहिये —सत्य कथन।

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  3. ashok joshi says:

    बहुत अच्छी जानकारी

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  4. ShankySalty says:

    चिंता से चतुराई घटे, घटे रूप और ज्ञान चिंता बड़ी अभागिनी, चिंता चिता समान
    मेरो चिंतयों होत नहीं, हरि चिंतयों हरि करे
    मैं रहुं निश्चित

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    1. Vimla wilson says:

      बहुत सुंदर

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