अपंग नही दबंग बने # जिंदगी की किताब (पन्ना # 383)

पिक्चर गूगल के सौजन्य से

किसी भी मंजिल को पाने के लिये परिश्रम या संघर्ष से नही घबराना चाहिये । जितना परिश्रम या मेहनत करेंगे उतने ही हम मजबूत बनेंगे ।ये मजबूती ही हमारी जिन्दगी की उडान को पूरा करने मे मदद करेगी । यदि हमारे सभी कार्य बिना मेहनत किये होने लगे तो धीरे धीरे अपंग हो जायेंगे । तितली के एक दृष्टांत से ये बात समझ सकते है ।

एक आदमी रोज सुबह सुबह पब्लिक पार्क मे सैर के लिये जाता और थोड़ी देर वहॉ बेंच पर बैठकर प्रकृति को निहारता । एक दिन उसकी नजर एक पेड पर पड़ी जिसकी टहनी पर एक तितली का कोकून लटक रही था । वह जब भी पार्क जाता उसे निहारता । एक दिन जब वह पार्क मे बैठकर कोकून को देख रहा था उसे एक छेद दिखाई दिया उसके अंदर तितली बाहर आने के लिये भरसक प्रयास कर रही थी । थोड़ी देर रूकती फिर बाहर आने की कोशिश करती । उस व्यक्ति से देखा नही गया और तितली पर दया आ गई । उठा और जाकर कोकून का छेद बडा कर दिया जिसे तितली आसानी से बाहर आ सके । और तितली आ भी गई लेकिन उसका शरीर सूजा हुआ और पंख सूखे हुये थे । वह आदमी तितली के उड़ने का इंतजार करने लगा लेकिन उड़ नही पाई क्योकि प्रकृति ने उसके लिये ऐसी व्यवस्था की थी कि जैसे जैसे तितली बाहर आने के लिये संघर्ष करेगी वैसे वैसे उसके शरीर से तरल प्रदार्थ पंखों मे जायेगा व उड़ान के योग्य बनायेगा लेकिन वह उस आदमी की दया के वजह से बाहर तो आराम से आ गई लेकिन पूरी जिन्दगी बिना पंखों के घसीट घसीटकर बितानी पड़ी ।

यदि व्यक्ति उस पर तरस ना खाकर उसे श्रम करने देता और तितली अपनी मेहनत के बल पर बाहर आती तो हमेशा के लिये उड़ान भर सकती थी लेकिन थोड़ी सी दया करने व श्रम मे चूक होने से ज़िन्दगी भर अपंग रहना पड़ा ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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