सोचने वाली बात # जिंदगी की किताब (पन्ना # 366)

मनुष्य सामाजिक प्राणी है । चाहे वह परिवार में हो या किसी समूह के साथ हो , आपस में मतभेद तो होता रहेगा क्योंकि वह विचार व अहंकार से भरा होता है ।

निर्जीव बर्तन भी एक साथ होने पर आपस में खटपट करते रहते है तो मनुष्य तो सजीव प्राणी है । जिनका आपस में मतभेद होना स्वाभाविक है । किन्तु मन भेद नहीं होना चाहिये ।

चाहे परिवार हो या समूह हो , माटी के घड़े की तरह नही होना चाहिये जो एक बार टूट गया तो फिर जुड़े ही नहीं । बल्कि मोतियों की माला की तरह होना चाहिये जो अगर टूट भी जाये तो उसे नये धागे के साथ फिर से एक सूत्र मे पिरोया जा सके ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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5 thoughts on “सोचने वाली बात # जिंदगी की किताब (पन्ना # 366)

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    1. सही है । इंसान की अलग अलग प्रवृतियाँ होने से मतभेद तो होगा ही लेकिन मनभेद होने से ज़िन्दगी भर रिश्तों मे दरार आ जाती है ….बहुत बहुत शुक्रिया

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