दुख को सुख मे बदलने की कला # जिंदगी की किताब (पन्ना # 332 )

किसी इंसान को जिन्दगी मे यदि कोई भी कष्ट आता है तो उसे दुख से जोड़ लेते है लेकिन कष्ट और दुख मे अंतर है । जरूरी नही कि कष्ट पाने वाला इंसान दुखी हो । कोई किसी को कष्ट तो दे सकता है लेकिन उसे दुखी नही कर सकता ।

आम इंसान सुख दुख को आर्थिक सम्पन्नता , विपन्नता से जोड़ता है ।लेकिन हकीकत मे ऐसा नही है । परिस्थिति के विपरित मन का होना दुख का कारण है ।

सुख दुख का अनुभव करने के लिये उसके प्रकार व कारणों का भी पता लगाना जरूरी है ।सकारात्मक सोच दुख मे भी सुख को खोज लेता है जैसे कि नीचे कुछ उदाहरण दिये है …….

🌺 अपाहिज कहता है कि मेरी तो एक टाँग टूटी है ,बहुत लोगो के तो दोनो पैर टूट गये ।

🌺 पत्थर से टकराकर चोट लगने पर एक इंसान बोला कि कम से कम सिर पर तो पत्थर नही गिरा ।

🌺 भूकम्प से पीड़ित व्यक्ति बोलता है कि मेरे पास कम से कम एक कमरा तो है कितने लोग तो फुटपाथ पर सो रहे है ।

🌺 खुश होकर साइकिल चलाने वाला बोलता है कि मेरे पास साइकिल तो है , कितने लोग बेचारे पैदल चलते है ।

🌺 दुर्घटना से हाथ कटने वाला बोलता है कि मेरा तो हाथ ही कटा है लेकिन साथ वाला बेमौत मारा गया ।

🌺 क़ीमती हीरे की अँगूठी खोने पर बड़ा भाई बोला ,चलो अच्छा ही हुआ । बँटवारे के समय इसी अँगूठी की वजह से पापा और चाचा मे झगड़ा बढ़ गया और आपस मे बात तक करना बंद कर दिया । कम से कम हम भाई भाई तो प्रेम से रहेंगे ।

देखा जाये तो सुखी या दुखी होना इंसान के हाथ मे है ।यदि व्यक्ति चाहे तो तत्काल सुखी हो सकता है ।

एक प्रसंग मे वासुदेव श्रीकृष्ण द्वारका से आ रहें थे । रास्ते मे एक खाई मे एक मृत कुत्ते की भयंकर बदबू आ रही थी ।जो भी देखता नाक बंद कर घृणा के भाव लाता । श्रीकृष्ण ने भी देखा लेकिन ना तो नाक सिकोड़ी ना ही घृणा के भाव लाये बल्कि प्रसन्नता से बोलने लगे कि देखो इस कुते की बतीसी कितनी चमक रही है , कितने सुंदर दॉत है ।

सकारात्मक सोचने वाला दुख मे भी खुशी , हानि मे से लाभ , तनाव मे भी आनंद , कुरूपता मे भी सुंदरता ढूंढ लेता है ।

आपकी आभारी विमला विल्सन

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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