दस आश्चर्य – जिंदगी की किताब (पन्ना # 330)

भौतिक जगत के सात आश्चर्य से तो आप वाक़िफ़ होंगे । आज आपको आध्यात्मिक जगत ( spiritual science ) मे जो दस आश्चर्य हुये है , उसे अवगत करायेंगे । जो निम्न प्रकार से है ।

1. पहला आश्चर्य …

अष्टगत सिद्धा – मध्यम अवगाहना ( शरीर की ऊँचाई) वाले एक समय मे 108 मोक्ष जाते है । उत्कृष्ट अवगाहना वाले नही । इस चौबीसी तीर्थंकर के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव जी (पॉच सौ धनुष की ) उत्कृष्ट अवगाहना वाले एक समय मे अपने 99  पुत्रों व भरत के आठ पुत्रों सहित 108 मोक्ष मे गये । यह आश्चर्य की बात हुई 

2. दूसरा आश्चर्य – 

हरिवंश/ कुलोत्पति – पूर्वभव के बैर के कारण देव के हरिवास नामक युगल को भरत क्षैत्र मे लाकर चम्पापुरी का राजा रानी बनाया । इनके पुत्र पौत्रादि से चली कुल – परंपरा “हरिवंश” रूप मे प्रसिद्ध हुई । मांसाहार एवं पाप कृत्यों के कारण हरि युगल मर कर नर्क मे गये । यो नियम से युगल के वंश परंपरा चलती नही और वे नर्क मे भी जाते नही । हरि युगल का इस प्रकार वंश चलना एवं नर्क मे जाना भी आश्चर्य हैं ।

3. तीसरा आश्चर्य – 

असंयत पूजा – सदा सर्वत्र संयत की पूजा होती है और वे ही पूजा के योग्य होते है परंतु अवसर्पिणी काल मे नववे तीर्थंकर सुविधि जिन के बाद ( साधु साध्वी का अकाल ) कुछ काल तक असंयतो की पूजा प्रतिष्ठा हुई । यह भी आश्चर्य है ।

4. चौथा आश्चर्य – 

स्त्री तीर्थंकर – पुरूष ही तीर्थंकर पद को प्राप्त करते है , लेकिन इस अवसर्पिणी काल मे उन्नीसवे तीर्थंकर मल्लीजिन स्त्री तीर्थंकर हुये । यह भी आश्चर्य है । 

5. पॉचवां आश्चर्य – 

कृष्ण का अपरकंका गमन – एक वासुदेव का दूसरे वासुदेव से मिलान होता नही , लेकिन 22 वे अरिष्टनेमी जिन के समय मे धातकीखंड द्वीप की अपरकंका नगरी मे द्रौपदी को लाने के लिये श्रीकृष्ण को जाना पड़ा , उस समय (वापिस लौटते समय) वहॉ के कपिल नामक वासुदेव से श्रीकृष्ण वासुदेव का सिर्फ शंख ध्वनि से मिलान हुआ । यह भी आश्चर्य है ।

6. छठॉ आश्चर्य  –  

गर्भ हरण – गर्भ का हरण या परिवर्तन सामान्यतः होता नही ,परंतु 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर के जीव का देवानंदा ब्राह्मणी की कुक्षी से त्रिशला क्षत्रियाणी की कुक्षी मे देवता द्वारा गर्भ हरण या परिवर्तन किया गया । यह भी आश्चर्य है ।

7. सातवॉ आश्चर्य –

 चमरोत्पाद  – नियम से चमरेन्द्र ( नीचे लोक का इंद्र ) कभी ऊँचे लोक मे जाता नही ,परंतु ध्यानस्थ खड़े भगवान महावीर की शरण लेकर एक बार चमरेन्द्र ,शकेन्द्र (ऊँचे लोक के इन्द्र) से लड़ने हेतु ऊपर गया । यह भी आश्चर्य है ।

8. आठवॉ आश्चर्य – 

अभव्या परिषद – तीर्थंकर भगवान को केवल ज्ञान होने पर वे जो प्रथम धर्मोपदेश देते है , उस परिषद मे कोई ना कोई भव्य जीव दीक्षा ग्रहण अवश्य करता है , परंतु 24 वे तीर्थंकर महावीर का प्रथम उपदेश ख़ाली गया , किसी ने दीक्षा ग्रहण नही की । यह भी आश्चर्य है ।

9. नववॉ आश्चर्य – 

चंद्र – सूर्य अवतरण – अपने निजी विमान मे बैठकर देव कभी मत्यर्लोक मे नही आते ,परंतु एक बार भगवान महावीर के समवसरण मे चंद्र – सूर्य एक साथ अपने अपने शाश्वत (निजी ) विमान मे बैठकर वंदन हेतु आये । यह भी आश्चर्य है 

10. दसवॉ आश्चर्य – 

उपसर्ग – केवल ज्ञान होने के बाद तीर्थंकर भगवान को देव – मनुष्य आदि कृत किसी तरह का उपसर्ग होता नही , परंतु 24 वे तीर्थंकर भगवान महावीर को केवल ज्ञान की प्राप्ति के बाद भी गोशालाक – प्रदत्त तेजोलेश्या का उपसर्ग हुआ । यह भी आश्चर्य है ।

श्रावक दर्पण पुस्तक – ठाणांग सूत्र …. से लिया गया है 

आपकी आभारी विमला विल्सन 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    Bahut badhiya lekh….gyanvardhak…..

    Liked by 1 person

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