खुशी # जिंदगी की किताब (पन्ना # 329)

 

हर रोज आती छोटी खुशियॉ की घड़ी

 कल रात दरवाज़े पर दस्तक पड़ी 

सामने खडी थी खुशियॉ बड़ी ।

मैने बहुत खुशी से बोला

हर पल दिल से स्वागत है तुम्हारा ।

छोटी छोटी खुशियॉ से भी बहुत खुश हूँ ।

लेकिन जाओ उन सब के यहॉ,

जहॉ मुझसे से भी ज्यादा जरूरत है ।

जाओ उन गरीब ,लाचार, बेघर लोगो के यहॉ

जाकर उनके बेहाल ,बेघर को सजा ।

जाओ बेबस बूढे ,अनाथ , विधवाओं के यहॉ ,

उनके दर्दी ऑखो मे ख़ुशियों के फूल खिला ।

जाओ ,तपती धूप , सर्द हवाओ से ठिठुरते बिन छत के लोगो के यहॉ 

उन सबको सर्द गर्म से राहत की साँस दिला ।

जाओ भूखे प्यासे ,कपड़े को तरसते भूखे नंगो के यहॉ 
उन्हे प्यार से रोटी खिला , कपड़ों से सजा ।

जाओ उन विरही के पास ,जिसके दिल मे जल रहे ऑसू के दिये 

उनके दिल मे खुशियॉ की लौ को जला ।

और इन सबसे से भी ज्यादा वहॉ ,
जहॉ जाना है तुम्हे जरूरी ।

जिस देश की सीमा की रक्षा के लिये ,

सिर पर कफ़न बॉधे खड़े है प्रहरी ।

घर परिवार वालों से दूर रहकर भी , 

सुख शांति और अमन के लिये 

कर रहे दुश्मन का दमन ।

उन शहीद वीर बहादुरो के परिवार वालों का 

जाकर बसा दे फिर से उजड़ा चमन ।

जाओ खुशियॉ उड़कर जाओ 

जाने मे तनिक भी देर ना लगाओ ।

चहूँ और खुशियॉ बिखराओ

सबके जीवन को महकाओ ।

खुशी हँसकर बोली 

जाती हूँ बाबा ,उन सब के यहॉ पर ।

लेकिन एक बात कह देती हूँ ,

जो दूसरो की खुशी मे भी अपना सुख मानता

भला उसको  छोड़कर कैसे जा सकती हूँ ।

इसलिये छोड़कर जा रही हूँ ,

अपनी परछाई तुम्हारे यहॉ 

तुम्हारे साथ खुश रहेगा सारा जहां ।

आपकी आभारी विमला विल्सन 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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