स्वयं पर भरोसे की चंद पंक्तियाँ –  जिंदगी की किताब (पन्ना # 318)

इधर उधर भटकने से अच्छा है , ख़ुद मे रह कर वक़्त बिताना 

दूसरो को आईना दिखाने से अच्छा है , ख़ुद का आईना देखना

इस दुनिया मे भेड़चाल चलने से अच्छा है , ख़ुद के साथ मजबूती से चलना

दूसरो के घर के झाकने से अच्छा है , ख़ुद के भीतर झाँकना 

तेरी, मेरी -इसकी ,उसकी करने से अच्छा है ,ख़ुद ही ख़ुद से बात करना

सारी उम्र बदन को महकाने से अच्छा है ,अपनी रूह को खूब महकाना

तन्हाई में खामोशी से बैठने से अच्छा है ,ख़ुद के गीत खुद को सुनाना

इस दुनिया भर में घूम लिए हो जी भर कर , वापस ख़ुद में लौट कर आओ तो अच्छा है।

आपकी आभारी विमला विल्सन मेहता 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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