अभिमान – जिंदगी की किताब (पन्ना # 314)

एक व्यक्ति ईश्वर की बहुत भक्ति करता था । एक दिन वह अपने गुरू से बोला , गुरूजी मै पिछले तीस सालों से तन्मयाकार होकर प्रभु भक्ति कर रहा हूँ फिर भी मुझे ज्ञान नही हुआ ,क्यों ? गुरूजी बोले देखो पुत्र तीस साल क्या तीन सौ साल भी तुम भक्ति करोगे तो भी तुमसे ज्ञान कोसो दूर रहेगा । वह व्यक्ति बोला कि ऐसा मे क्या करूँ कि मुझे सच्चा ज्ञान प्राप्त हो जाये । 

गुरूजी बोले कि साधारण वस्त्र पहनकर हाथ मे ख़ाली कटोरा लेकर तुम अपने कुटुम्ब , मोहल्ले वालो से भिक्षा मॉगो । यह सुनते ही वह व्यक्ति बोला कि यह कैसे हो सकता है कि मै भिक्षा मॉगू वो भी मोहल्ले और कुटुम्ब वालों से  ? नही नही ये सब मेरे से नही होगा ।

गुरूजी बोले तो फिर ज्ञान कैसे हो सकता है ? अभिमान ज्ञान का विरोधी है , शत्रु है । जब तक अभिमान का सर्वथा नाश नही होता तब तक तुम्हारे मे ज्ञान का उदय नही होगा । अभिमान ही भेदभाव करवाता है । परंतु वास्तविक ज्ञान ,भक्ति मे भेदभाव नही रहता है और भक्त जाति , रूप, कुल, धन , क्रिया, विद्या ..आदि के आधार पर किसी को छोटा या बड़ा नही मानता । इसमे स्वयं को अगुरू लघु स्वभाव वाला बनना पड़ता है । 

संक्षेप मे जहॉ किसी भी प्रकार का अभिमान न हो , वही वास्तविक ज्ञान की प्राप्ति होती है ।

आपकी आभारी विमला विल्सन 

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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2 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    जहाँ अभिमान वहां ज्ञान कहां।बिल्कुल सही कहा।

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    1. सराहने के लिये शुक्रिया

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