लफ़्ज़ - (10,11,12)

1.क़ुदरत को नापसंद है सख़्ती ज़बान मे ।

पैदा हुई न इसलिये हड्डी ज़बान मे !

2. बिना नम्रता के कही सुना ज्ञान पड़ा 

बिना झुकाये कूप मे भर सकता ना घड़ा !

3. बनी रहे कुटुम्ब मे प्रतिष्ठा , झलके चाल चलन से ।

ये सब मिल जाने पर निश्चिंत होकर , फिर रमाये मन प्रभु भक्ति मे ।

आपकी आभारी विमला मेहता 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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10 Comments Add yours

  1. बहुत खूब विमला जी।

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  2. Deep_Pawan says:

    लाजबाव।

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  3. अद्भूत कलाकृति जय सच्चिदानंद

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    1. धन्यवाद नागेश्वर जी ..जय सच्चिदानंद

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  4. Madhusudan says:

    क़ुदरत को नापसंद है सख़्ती ज़बान मे ।
    पैदा हुई न इसलिये हड्डी ज़बान मे …..waah …..kyaa dhundh kar shabdon ka istemaal kiya hai….lajwaab.

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    1. आपको अच्छा लगा …बहुत बहुत धन्यवाद मधुसूदन जी

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      1. Madhusudan says:

        Swagat apka….badhiya likha achchaa lagna swabhawik hai…

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