अवचेतन मन -इच्छाओं का वृक्ष(भाग दो )-जिंदगी की किताब (पन्ना # 19)

अवचेतन मन -इच्छाओं का वृक्ष..भाग दो …
आईये पहले मन के विषय मे जान ले । हमारे भीतर दो मन होते है -चेतन मन और अवचेतन मन। चेतन मन यानि वह मस्तिष्क, जो सोचता है और जिसके बारे में हम जागरूप होते है। दूसरी ओर, हमारे भीतर एक अवचेतन मन भी होता है, जो हमें दिखाई तो नहीं देता है, लेकिन यह हमें जल्दी से और सही तरीक़े से काम पूरा करने के नए-नए तरीक़े सुझा सकता है। 
कोई भी बात दोहराने से हर चीज अवचेतन मन का हिस्सा (आदत) बन जाती है। अवचेतन मन सच और कल्पना में अंतर नहीं करता। इनके आधार पर अब हम अपने जीवन में आदतों में जैसा चाहें बदलाव ला सकते हैं, नए गुण डाल सकते हैं, हमारा स्वभाव बदल सकता हैं।  

जब हम बदलाव चाहते हैं तब अनेक प्रकार के विचार एक साथ चलने लग जाते हैं। कोई भी विचार या निष्कर्ष शक्तिशाली और निश्चित नहीं होने के कारण अवचेतन मन को प्रभावित नहीं कर पाता है, इसलिए वास्तविक बदलाव अपने जीवन में लाना है तो अपने विचारो को एक पेपर पर लिखें।उसे वर्तमान वाक्य में लिखें। जैसे कि आत्मविश्वास की कमी है तो लिखें कि मैं आत्मविश्वास से भरा हूं। याददाश्त शक्ति कमजोर है तो लिखें कि मेरी याददाश्त शक्ति बहुत तेज है।सुबह जल्दी नहीं उठते हैं तो लिखें कि मैं सुबह ठीक पांच बजे उठ जाता हूँ ।यानि कि जो भी हमने निश्चय किया है और उसको पूरा कर लिया हैं ऐसा सोचना और लिखना हैं हमे वर्तमान के विचार लिखने है या दृढ़निश्चय करना हैं । वाक्य वर्तमान के लेने है भविष्य के नही ।अवचेतन मन भविष्य के शब्द को, भविष्य की तरह लेता है। अगर हम कल्पना में यह दृश्य बनाते हैं कि हम उस अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं और हम वैसे ही हो चुके हैं । जैसा चाहते हैं ,अवचेतन मन इसी वर्तमान के दृश्य को स्वीकार करेगा और वैसी ही ऊर्जा निर्मित करना शुरू कर देगा। नकारात्मक भाव कभी न लिखें। मान लीजिए हम चाहते हैं कि हमारा क्रोध समाप्त हो जाए तो हम अगर यूं लिखेंगे कि अब मुझे क्रोध नहीं आता, तो हम क्रोध को ही दोहरा रहे हैं। इसके विपरीत शांत व्यवहार का या समताभाव का हम वाक्य में लिखेंगे तो अवचेतन मन में वही सारे शब्द रिकॉर्ड हो जाएेंगे । अवचेतन मन को एक दृष्टांत से समझा जा सकता हैं ……

एक बटोही मार्ग मे किसी बुढ़िया के पास छाछ पीकर परदेस के लिये रवाना हो गया । छ: महीने बाद जब वह वापस लौटा और चलते चलते उसी बुढ़िया के गॉव से गुज़रा तो उस बुढ़िया ने उसको देखते ही कहा अरे बेटा ,मुझे प्रसन्नता हैं कि अभी तक तुम ज़िंदा हो ।उस बटोही ने पूछा क्यूँ क्या हुआ ? आप इस तरह से क्यों पूछ रही हैं ।वह बुढ़िया बोली बेटा दरअसल बात यह हैं कि छ: महीने पहले जब तुम मेरे पास से जो छाछ पीकर गये थे ,उस मटके वाली छाछ मे मरा हुआ सॉप पड़ा था ।इतना सुनते ही उस बटोही को सॉप का ज़हर चढ़ गया या यूँ बोल सकते है कि ज़हर का असर हो गया ।और वह बटोही मर गया । इस दृष्टान्त का कहने का सारांश यह है कि अवचेतन मन के कारण भूतकाल की घटी घटनाओं का वर्तमान पर भी असर हो सकता हैं ।जैसे ही हमारा मस्तिष्क किसी निर्देश को फ़ॉलो करता है तो उसका असर होने लगता हैं ।

चेतन परत के मुकाबले मस्तिष्क की अवचेतन परतें अधिक महत्वपूर्ण हैं। अगर हमारा नाता अपने ही अवचेतन से टूट गया तो हमारा जीवन स्वस्थ और संतुलित नहीं रह पाता। जब भी आदमी किसी रोग से ग्रसित होता है तो उसकी जड़ें उसके अंदर तक अवचेतन मन में होती हैं । कोई दबाया हुआ क्रोध या दुख या भय अंदर पड़ा-पड़ा नासूर बन जाता है और फिर वह कैंसर या अन्य किसी रोग के रूप में प्रगट होता है। वो रसायन शरीर के अंगों में प्रवेश कर उन अंगों को कमजोर बनाता है और धीरे-धीरे रोग उनमें घर बना लेता है। 

मैं ये काम कभी नहीं कर सकता ।मुझे डर लगता हैं …..ये सब अपने ही बारे में बोलते हैं ।दरअसल ये हमारे डर,संदेह , आशंकाएं और संकोच हैं जिन्हें हम अपने दिमाग में सेट कर देते हैं ।हमारा मस्तिष्क इन निर्देशों की प्रतीक्षा करता है और सुन रहा होता है कि हम क्या कहते हैं ।जब इस तरह के नकारात्मक दिशा निर्देश हम अनजाने में अपने शरीर के नियंत्रण कक्ष “अपने मष्तिस्क “को देते हैं तो नतीजन ये सब हमारे मस्तिष्क में जमा हो जाता है । । उदाहरण के लिये अगर आप धुम्रपान करते हैं लेकिन वास्तव मैं छोड़ना चाहते हैं और छोड़ नहीं पा रहे तो अपने आप से कहिये-मैं धुम्रपान छोड़ चुका हूँ ।ऐसा अपने आप से और दूसरों से भी कहिये कि मैं धुम्रपान नहीं करता ।जब आप पहले पहले ऐसा करेंगे तो आपके मित्र या अन्य लोग आपको पागल समझेंगे और हंसी भी उड़ा सकते हैं ,लेकिन फिर भी आप बिना किसी की परवाह किये ऐसा करते रहिये । क्यूंकि आप धुम्रपान छोड़ना चाहते हैं जैसे आपको धुम्रपान करने की आदत पड़ी है वैसे ही आप मैं धुम्रपान नहीं करता ये बोलने की भी आदत बना लीजिये ।कुछ समय बाद ऐसा होगा कि जब आप धुम्रपान के लिए सिगरेट जलाएंगे और साथ ही बोलेंगे कि मैं धुम्रपान नहीं करता तो आपका अवचेतन मन आपसे कहेगा कि फिर तू ये माचिस क्यूँ जला रहा है ।ऐसा इसलिए होता है क्यूंकि नये विचार आप अपने अवचेतन मन को दे चुके हैं । आपका अवचेतन मन सहज रूप से स्वीकार कर लेता है कि आप धुम्रपान नहीं करते ।अब आपको धुम्रपान की जरूरत ही नहीं है और आपको मजबूर कर देता है धुम्रपान न करने के लिए ।

अगर एक लम्बे समय तक आप अपने अवचेतन मन से कुछ कहते हैं चाहे वो सच हो न हो,सही हो या गलत हो ।आपका अवचेतन मन उसे सच और सही मानने लगता है और उन निर्देशों के अनुसार काम करने लगता है ।आपको वो काम करने या न करने के लिए राज़ी कर लेता है इन नये विचारो का हावी होना कोई जादू,सम्मोहन ,तपस्या या किस्मत का परिणाम नहीं है बल्कि ये आपके मष्तिस्क के अलग ढंग से काम करने की वजह से है ।मष्तिस्क अलग ढंग से काम कर रहा है क्यूंकि ऐसा करने के लिए आप उसे कह रहे हैं ।अपने आप से सही ढंग से बात करना सीखिए,सही शब्दों का चुनाव कीजिये ,आपका काम हो जायेगा ।

आप वास्तव में जो बनना चाहते हैं उसे अपने अवचेतन मन में आप अपनी वो तस्वीर रख देते हैं और उससे कहते हैं कि ऐसा बनना चाहता हूँ और मैं चाहता हूँ कि मुझे ऐसा बना दो।जैसे कि ……मैं सुव्यवस्थित हूँ…..मेरे जीवन पर मेरा नियंत्रण है…..मैं विजेता हूँ……मैं स्वस्थ हूँ…..मैं उर्जा और उत्साह से भरा हुआ हूँ……कोई भी चीज मुझे मेरे लक्ष्य तक पहुचॉने से नहीं रोक सकती…..मैं जैसा हूँ वैसा अपने आप को पसंद करता हूँ……मैंने जो जीवन चुना था वो ही जी रहा हूँ और मेरा चुनाव बिलकुल सही था……मेरी ऐसी कोई आदत नहीं है जो मेरा नुकसान करे और मुझे पीछे ले जाये……मैं धुम्रपान नहीं करता,मेरे फेफड़े बिलकुल साफ़ और स्वस्थ हैं आदि….

पुरानी समस्याएं अब जीवन में अपने आप को साबित करने के लिये मौके में बदल जाती हैं ।सकारात्मक विचार नही को हॉ मे बदल देते हैं जो हमे प्रोत्साहित,मजबूत बनाती है और हमारे अन्दर एक नया क्रियाशीलता पैदा करती है.यह हमारे दिल को प्रसन्न करती है , हमारी आशाओं को छूती है,हमारे सपनों को नए रंग देती है,ये हमें आगे ले जाती हैं ।

अवचेतन मन का आध्यात्मिक क्षैत्र मे भी महत्वपूर्ण भूमिका हैं यदि हम मस्तिष्क को रोज़ स्पिरीचुअल निर्देश दे जैसे कि ……मैं संसार का हिस्सा हूँ और संसार मेरे अन्दर समाया हुआ है….मैं ईश्वर के तेज की तरह हूँ…..मैं ईश्वर का भक्त हूँ और वो मेरे अन्दर छुपा है…..मैं अनंत सुख का धाम हूँ …आदि तो हमारे अंदर इन शब्दों का असर होने लगता हैं और हमारी प्रकृति भी वैसी ही होने लगती हैं । 

अवचेतन मन जो आपको आपका काम समय पर करने योग्य बना सके, जो आपको आपके पारिवारिक मसलों को सुलझाने में सहायक हो,जो आपको अपनी स्वाभिवकता दे सके जिसके कि आप वास्तव मे लायक हैं और जो आपको वो सब चीजे दे सके जिनकी कि आपको जीवन में जरूरत है और आपको चाहिये।

अवचेतन मन का संदेश,आवाज सुनें। और अच्छी सोच का निर्देश दे । एक बार फिर पुरानी पीड़ाओं से छुटकारा पाये । अपने आप से दोस्ती और प्यार करें ।

आपकी आभारी विमला मेहता
जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

picture taken from google 

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4 thoughts on “अवचेतन मन -इच्छाओं का वृक्ष(भाग दो )-जिंदगी की किताब (पन्ना # 19)

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  1. बहुत ही सुंदर कथा वृतांत जिसे उदाहरण के रूप में आपने लिया।बड़े ही सुंदर ढंग से चेतन और अवचेतन मन का फर्क और जीवन मे महत्व समझाया।

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