चिट्ठियाँ – जिंदगी की किताब (पन्ना # 291)

वो भी क्या दिन थे जब हम चिट्ठियों के जरिये  अपनी भावनाओं को स्याही मे डुबोकर व्यक्त किया करते थे । हर शब्दो मे अपनेपन की महक आती थी ,  हालचाल जानने के लिये चिट्ठियाँ का इंतजार रहता था ।  पर आजकल के कॉम्पिटिशन वाले वैज्ञानिक युग मे  व्यस्त जिंदगी होने के साथ मोबाइल ,इंटरनेट…