लफ़्ज़ -7,8,9 

‪सर नही ऊँचा कभी ,रहते सुना अभिमान का ‬

अपने ऊपर ही पड़ता है ,थूका हुआ आसमान का 

“यौवन” , “वाणी” ,अरू “समय” “बहता हुआ जल ” एक बार जो जाय

खूब कहे इन चारो को ,मुड़कर वापिस ना आय

जीवन एक वृक्ष है फ़ानी ,बचपन तने ,शाख जवानी

फिर है पतझड़ खुश्क बुढ़ापा ,उसके बाद है खत्म कहानी 

आपकी आभारी विमला मेहता 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

Advertisements

4 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    “यौवन” , “वाणी” ,अरू “समय” “बहता हुआ जल ” एक बार जो जाय

    खूब कहे इन चारो को ,मुड़कर वापिस ना आय….bahut khub kaha ….bahut khub likha……umda.

    Liked by 1 person

  2. अपने ऊपर ही पड़ता है ,थूका हुआ आसमान का 

    बहुत ही खूब लिखा है!!

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s