ज्ञान की ज्योति – जिंदगी की किताब (पन्ना # 270)

ज्ञान की ज्योति


ज्ञान के दीप

ज्ञान की ज्योति

तुमने ऐसी जलाई

जाग उठी तरूणाई

जिन्दगी को महकाई

भूल गया जीवन क्या है 

क्या यह भी पुलकित होता है

क्या यह भी रसमय होता है 

अनभिज्ञ बना था इससे भी

पाने वाला भी खोता है 

भू ने स्नेह व्यथा है गाई

तुमने ऐसी ज्योति जलाई

भटका था अँधियारों में मै 

ज्ञान दीप तुम जला गये

अवनति से उन्नति पथ पाया

भव चक्रों को पार लगाने की

जो अमर क्रान्ति तुम जगा गये 

ख़ुशियों की बौछार लगाई

बसंत बहारें फिर आई 

तुमने ऐसी ज्योति जलाई

निज शब्दो के अधखुले द्वार से

नत मस्तक होकर

आभार प्रकट करता हूँ मै

निज सरस पुष्पवत शब्दो को 

तुमको ही अर्पित करता हूँ

रंगो मे फिर बहार लाई

आनंदित घटा पुन: छाई

तुमने ऐसी ज्योति जलाई

हे ईश्वर अब मेरा जीवन 

तेरा है तुझको ही अर्पण

है श्रद्धा और विनय से डूबा

कब ,कौन, कहॉ दे संग छोड़ 

है तेरी कृपा से मुझे विदित

अधर्म मिटे अकुलाई

तुमने ऐसी ज्योति जलाई

आपकी आभारी विमला मेहता

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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4 Comments Add yours

  1. Madhusudan says:

    हे ईश्वर अब मेरा जीवन

    तेरा है तुझको ही अर्पण

    है श्रद्धा और विनय से डूबा

    कब ,कौन, कहॉ दे संग छोड़

    है तेरी कृपा से मुझे विदित

    अधर्म मिटे अकुलाई

    तुमने ऐसी ज्योति जलाई….bahut hi badhiya likha hai…..

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  2. बहुत ही अच्छा लिखा है आपने और और बहुत खूबसूरत भाव है।

    Liked by 1 person

    1. धन्यवाद रजनी जी । आपको अच्छा लगा

      Liked by 1 person

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