ढूँढती हूँ मै -जिंदगी की किताब (पन्ना # 255)

निराशा की परछाइयों  मे  आशा की किरण ढूँढती हूँ !!  डूबे हुए किनारों पर मैं  रेत का निशान ढूँढती हूँ !! हर एक संबंधो मे प्यार का अहसास ढूँढती हूँ !! किसी गुज़रे हुये मुसाफ़िर के पैरों के निशान ढूँढती हूँ !! बहते इक तूफ़ान के बाद  ठहराव की मंजिल ढूँढती हूँ !! खोये हुये…

घर – जिंदगी की किताब (पन्ना # 245)

Good day to all divine souls …   घर को एक बग़ीचे की तरह रहने दो । वह तभी खूबसरत लगेगा जिसमें सब तरह के फूल खिले हो । उसको खेत की तरह ना रखो जहॉ एक ही तरह की खेती होती है । बग़ीचे मे बीज जितना अधिक अंकुरित होगा उतना ही विशाल वृक्ष…