गुरू की महिमा …. गुरू पूर्णिमा पर सबको हार्दिक बधाई


गुरू की महिमा …….

सदगुरू बिना ज्ञान नही ,ऐसे तो सदगुरू का जितना भी बखान करो उतना ही कम है । 

हर व्यक्ति के मन मे दो स्थिती होती है —

पहली स्थिति मे जब मनुष्य के अंतर्मन से भक्ति , ज्ञान , वैराग्य उत्पन्न होने लगता है तब परमात्मा का द्वार खुलता है और मानव सहजता से उस द्वार मे प्रवेश कर जाता है।जहॉ वह धीरे धीरे कर्मो की निर्जरा करके ,अंत मे परमात्म की उच्च दशा को प्राप्त कर सकता है ।

दूसरी स्थिती मे जब मनुष्य काम ,क्रोध मोह ,माया और लोभ करता है तो वह बार बार संसार मे भटकता रहता है ।

पहली स्थिती प्राप्त करने के लिये सदगुरू का होना बहुत आवश्यक है । जब व्यक्ति को सदगुरू मिल जाता है और वह सदगुरू की शरण पाता है तो ,सदगुरू उसकी जिंदगी मे हित व अहित क्या है उस स्थिति से उसको अवगत कराते है। इसको हम इस उदाहरण से समझ सकते है , जैसे कि एक गाडी है उसमें अलग अलग कार्यों के लिये अलग अलग सिस्टम होते है,परन्तु यदि गाड़ी चलाने वाला उन सिस्टम के बारे में नही जानता है तो वह जहां ब्रेक लगाने की आवश्यकता होगी , वहॉ यदि एक्सीलेटर का प्रयोग करेगा तो दुर्घटना होने की पूरी-पूरी संभावना हो जाती है। परन्तु यदि वह व्यक्ति किसी ट्रेनर से गाड़ी चलाना सीखता है तो वह आराम से गाड़ी चला सकता है। 

ठीक इसी प्रकार यदि हमे शाश्वत सुख प्राप्त करना है, हम कैसे इस भवसागर को पार लगा सके ? तो हमे सदगुरू की शरण मे जाना चाहिये जो इसका ज्ञान देते है । उनसे ज्ञान प्राप्त करने के लिये सबसे पहले पूर्ण विश्वास के साथ खुद को सदगुरू के चरणों मे समर्पित होना पड़ता है । वह हमें जीने की सही कला सिखाते है, सत्य क्या है इसका अनुभव कराते है ताकि हम अपनी जीवन रूपी गाडी को सही ढंग से बिना राग द्वेष किये जीवन की नैया पार लगा सकते है।​

सदगुरू मे अपार करूणा होती है ,करूणा के सागर होते है । एक छोटे बच्चे जैसी निर्दोषता होती है ।इनका प्रेम शुद्ध प्रेम का झरना होता है । निष्पक्षपाती होते है …….सदगुरू का वर्णन करने मे वाणी असमर्थ होती है ,कलम रूक जाती है । इसको सिर्फ अनुभव से महसूस किया जा सकता है ।

जय गुरूदेव 🙏🙏
लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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6 Comments Add yours

  1. joyshimmers says:

    HAPPY GURU PURNIMA!! GOD BLESS:)))

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  2. Madhusudan says:

    Sach me bin guru gyaan kahaan….aapko bhi guru purnimaa ki hardik badhayee…

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  3. गुरु के सामने अपने को सदैव अति लघु समझना ही उत्तम है

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    1. सही कहा । लघुतम रहकर ही हम ज्ञान अर्जित कर सकते है

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