संतोषी स्वभाव….

आजकल लोग ज़िंदगी की उलझनो में इतने उलझे हुए हैं कि उन्हें ज़िंदगी का सही मकसद नज़र नहीं आता कि वाकई उन्हे क्या करना चाहिये । वह हमेशा जिंदगी मे अतृप्त ही रहता हैं । 
भौतिक सुख पाने की लालसा मे पूरी जिंदगी दौड़भाग ही करता रहता हैं लेकिन फिर भी कुछ नही मिलता।।इसकी एक वजह असंतोषी स्वभाव हैं ।उदाहरण के लिये एक चींटी अपने मुँह में चावल लेकर जा रही हैं । चलते-चलते उसको रास्ते में शक्कर मिल गई। उसे भी लेने की इच्छा हुई, लेकिन चावल मुँह में रखे तो शक्कर कैसे मिलेगी? शक्कर लेने को जाती तो चावल को छोड़ना पड़ता ।चींटी तो दोनों लेना चाहती थी । हमारी स्थिति भी उसी चींटी जैसी है। हम भी संसार के विषय भोगों में ऐसे ही फँसकर रहते हैं, एक चीज मिलती हैं तो चाहते हैं कि दूसरी भी मिल जाए, दूसरी मिलती हैं तो चाहते हैं कि तीसरी मिल जाए। यह श्रंखला बंद ही नहीं होती और उसी दौरान हमारी जिंदगी का जाने का समय आ जाता है। 
हम आऐ दिन ये दोहराते तो रहते हैं कि संतोषी सदा सुखी लेकिन पालन नही करते हैं । जिस मनुष्य के पास संतोषरूपी गुण है, उसे पानी की एक बूँद भी समुद्र के समान लगती है वरना समुद्र भी एक बूँद पानी की तरह लगेगा । उदाहरण के लिये यदि हमारे पास हजार रुपए हैं तो सोचते है कि क्या है मेरे पास ? दस हज़ार हो जाएँ तो कुछ होगा ।दस हज़ार होते ही हम ये सोचते है कि दस हज़ार से क्या होता है? औरो के पास तो एक लाख हैं । अब गए दिन लाख रूपये के, लाखो मे हो तो कुछ होगा । यह असंतोषी स्वभाव ही दुख का कारण हैं और जन्मो जन्मों तक दौड़ लगवाता हैं । 
संतोषी स्वभाव के संदर्भ मे लघु कथा…..
एक नगर सेठ था ।उसने कोई सामाजिक महोत्सव पर पूरे नगर के लोगो की तीन सूचियाँ बनाई । जिसमे उत्तम ,मध्यम ओर साधारण आर्थिक स्थिती वाले लोग थे। उत्तम स्थिती वाले के लिये कोरे लाडू ,मध्यम वाले के लिये लाडू मे एक रूपये का सिक्का,गरीब के लिये लाडू मे एक स्वर्ण मुद्रा रखना दी । फिर उसने सारे लाडू बँटवा दिये ।

एक गरीब विधवा जिसके चार संतान थी ।उसे सब मिलाकर पॉच लाडू के साथ पॉच स्वर्ण मुद्रा मिली ।लेकिन उसने कुछ सोचकर तुरंत वे सारी मुद्राये बच्चों के साथ सेठजी को लौटा थी । वह दिल से बहुत अमीर थी बिना वजह किसी से भी लेना उसे मंज़ूर नही था ।साथ मे एक आशंका भी थी कि कही सेठजी की नीयत तो उसके प्रति खराब तो नही ?कुल मिलाकर वह संतोषी स्वभाव की थी ,उसे अपने मेहनत से कमाये पैसों पर विश्वास था । वह सबकी मददगार भी थी ।किसी भी व्यक्ति की ज़रूरत पर पूरे दिल से सहायता करती,न दिन देखती ना रात ।
सेठजी को उसके द्वारा स्वर्ण मुद्रा लौटाने पर आश्चर्य हुऑ लेकिन कारण भी समझ मे आ गया ।उसके आचरण से बहुत प्रभावित होकर तुरंत उस गरीब विधवा के यहॉ गये और उसके घर पर पड़े फटे कपड़े की चिंदी मॉगी और कहा कि बहन इसे मेरी कलाई पर बाँध दो । मैं राखी बंधवाने आया हूँ ।वैसा ही किया गया । फिर राखी की भेंट स्वरूप सेंठजी ने उसे पॉच मुट्ठी स्वर्ण मुद्रायें दी । तो देखा कि संतोषी होने का क्या परिंणाम होता हैं ।
संतोषी आदमी रूखी रोटी भी इस तरह से खायेगा कि अमीर आदमी भी उसके सामने सोचने को विवश हो जायेगा । भगवान महावीर जो निर्वस्र रहते थे , फिर भी उनके चरणों में बड़े से बड़े सम्राट झुकते थे ।क्या ऐसा था भगवान महावीर के पास?क्योंकि उनमे वीतरागता थी व साथ मे संतोषी स्वभाव ।
संतोष का अर्थ हैं जो है, धन्य मेरा भाग ।जो कुछ भी मिला वह सब ईश्वर की कृपा है। मैं उनका आभारी हूँ।
संतोषरूपी गुण से जिसने भी प्रेम किया,दोस्ती की,वह जिंदगी की दौड़ मे जीत गया ।
लिखने मे गलती हो गई हो तो क्षमायाचना 🙏🙏
जय सच्चिदानंद 🙏🙏

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5 Comments Add yours

  1. NAREN says:

    लाजवाब

    Liked by 1 person

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