सच्चा सुख खोजन चला …..

सच्चा सुख खोजन चला …..

हर इंसान सुख की खोज मे जगह जगह भटकता रहता है संसार की कोई भी वस्तु सुख नही दे सकती ,कोई भौतिक वस्तुओं से ,तो कोई सम्बन्धो से सुख की अभिलाषा करता हैं उसे सुख मिलता है लेकिन थोड़े समय के लिये ,और फिर उसे लगता है यह सुख सच्चा नही । मन में यही सवाल खडा होता है कि आखिर सच्चा सुख है क्या ?किसी ने बताया कि पैसे में सुख है, तो उसके बच्चे बिगड़ गये ।दूसरे ने कहा, ‘पैसे तो मिले पर उसको संभालकर रखने के चक्कर मे पल भर की शान्ति नहीं है।किसी ने बोला, पैसा तो बहुत है, पर खाने वाला कोई नहीं है।कोई कहने लगा,खाने वाला तो है, पर वह अबसेंड दिमाग़ वाला है।औरो ने कहा, सब कुछ है, पर शरीर स्वस्थ नही है।। 

सुख-शान्ति कैसे मिले, हमें यह सोचना है। जहां राज्य, लक्ष्मी, रिद्धि-सिद्धि, बडप्पन, मान-सम्मान सभी हो वहॉ भी शांति का अनुभव नही होता है ।हमें सच्चा सुख पाने के लिये आध्यात्मिक गुरू की शरण मे जाना चाहिये । सच्चे सुख की बात से बचपन मे दादी से कही कहानी याद आती है जो इस प्रकार हैं …..

एक व्यक्ति दुख से बहुत परेशान होकर अपने गुरुजी के पास गया और बोला, गुरुदेव, मैं अपनी जिंदगी मे दुखो से बहुत परेशान हो गया हूँ कृपया करके मुझे दुख से छूटने का कोई उपाय बताइए। बहुत मुश्किल प्रश्न था।

 गुरु ने कहा, एक काम करो, जो आदमी सबसे सुखी है, उसके घर से अनाज लेकर आओ। फिर मैं तुझे दुख से छूटने का उपाय बता दूंगा। 

शिष्य चला गया। एक घर में जाकर पूछा, भाई, तुम तो बहुत सुखी लगते हो। मुझे कोई भी अनाज दे दो ।उसने कहा, कमाल करते हो भाई! मेरा भाई इतना गुस्सैल है कि क्या कहूं? ऐसी स्थिति में मैं सुखी कैसे रह सकता हूं? मैं तो बहुत दुखी इंसान हूं। वह दूसरे घर गया। दूसरा बोला, अब क्या कहूं भाई? सुख की तो बात ही मत करो। मैं तो अपनी पत्नी की वजह से बहुत परेशान हूं। ऐसी जिंदगी बिताने से तो अच्छा है कि घर छोड़ कर चला जाऊं। सुखी आदमी देखना चाहते हो तो किसी और घर जाओ। वह तीसरे घर गया ,वहॉ पत्नी पति से परेशान थी ।कही और गया वहॉ मॉ बाप बच्चो को कृतघ्न बताते ।पुत्र के पास गया तो पिता के नियमों की वजह से खुद को दुखी बताता।कही पर इंसान पैसों को लेकर दुखी था ,तो कही व्यक्ति अपने स्वास्थ्य को लेकर । सैकड़ों घरों के चक्कर लगा आया।, सुखी आदमी के घर से अनाज मिलना तो दूर बल्कि खुद भी भूख प्यास से परेशान हो गया ।

शाम को वह गुरुजी के पास आया और बोला, मैं तो घूमते-घूमते परेशान हो गया लेकिन किसी भी सुखी आदमी से अनाज नही मिला ।

 गुरु ने पूछा,क्यूँ क्या हुआ,सभी के सभी लोग दुखी हैं? उन्हें किस बात का दुख है? कोई तो उनमें से सुखी होगा । दुखी होने के क्या कारण है ? ऐसे कई सारे सवाल एकसाथ पूछ लिये गुरूजी ने ।

उसने एक एक करके सबका कारण बताया कि किसी का पड़ोसी,तो किसी का भाई खराब है। कोई पत्नी से परेशान, कोई पति से दुखी तो कोई पुत्र से परेशान है ……आज हर आदमी दूसरे आदमी के कारण दुखी हो रहा है।

 गुरूजी बोले,अब समझ आया कि सुखी कोई भी नही हैं ।क्योंकि हर व्यक्ति सुख की अभिलाषा दूसरे के आधार पर करता हैं । स्वयं को ख़ुद से कैसे सुखी करे इसके लिये प्रयास नही करता हर समय यह सोचता है कि यदि ये स्थिति ऐसे हो जाये तो मैं सुखी होऊँगा ।

यदि ये सब बाते तुम्हें सीधे से बता देता तो तुम समझ नही पाते इसलिये मैने तुम्हें हर घर अनाज लेने के बहाने भेजा ताकि तुम्हें अनुभव करके मालूम चले कि इस दुनिया मे कोई सुखी नही हैं ।ये बात तुम पूरे जीवन में नहीं भूलोगे। 

गुरु ने आगे बताया कि सुखी रहने के लिये सबसे ज्यादा जरूरी ,दूसरे की ओर नहीं, बल्कि अपनी ओर देखो। खुद में झांको। खुद पर भरोसा करो। प्रतिस्पर्धा करनी है तो खुद से करो, दूसरों से नहीं। जीवन स्वयं की यात्रा है जो ख़ुद को अपनी क़ाबिलियत के हिसाब से पूरी करनी पड़ती हैं ।दूसरों को देखकर अपने रास्ते को नही बदलो। खुद की सुनो और स्वयं को देखो। यही सुखी रहने का मंत्र हैं ।

सुख का उत्तम साधन वही है जो सबको समान सुख दे सके। ऐसा सुख जो प्राप्त होने के पश्चात् कैसी भी परिस्थिति हो,लेकिन किसी भी दुःख का असर न हो।। सुख और दुख सभी स्थितियों मे समान भाव रहे ,हमेशा आनंद का अनुभव करे ,वह सच्चा सुख यानि आत्मा का सुख कहलाता हैं 

जो किसी एक को सुख पहुंचाए और दूसरे को दुख, वह सुख का साधन नहीं है ।इसलिये कहा जाता है कि आत्मा अनंत सुखों का धाम हैं । आत्मसुख का अनुभव एक आत्मज्ञानी पुरूष ही करवा सकता है ।

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्राथी🙏🙏

 
रंगबिरंगे विचार (मेरी कलमससे)

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