वृद्धावस्था vs युवा पीढ़ी …..विचार दोनो की नजर मे -जिंदगी की किताब (पन्ना # 11)

वृद्धावस्था vs युवा पीढ़ी …..विचार दोनो की नजर में
वर्तमान में वृद्धों के कष्टों को देखकर मन में हमेशा ही प्रश्न बना रहता है कि बुढापा एक अभिशाप है या वरदान?  
हमारे समाज में अधिकांश लोग अपने वृद्धों को भले ही बोझ समझता है लेकिन फिर भी वे अपने उम्र के इस पड़ाव में अपनी ही औलाद की सेवा-भाव को एक महान ईश्वरीय कृपा समझते हैं। बुढ़ापे में लगी चोट तो बड़ी ही घातक होती हैं,जब उनकी संतानें उन्हें भूल जाती हैं ।

वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि यह कहानी हर एक के जिंदगी मे दोहरायी जाती है ,सभी को उम्र के उस पड़ाव से गुजरना है । हमे जीवन में अपने माता-पिता के प्रति हमें भी वैसा ही विचार रखना चाहिए, जैसा वे हमारे बचपन में हमारे लिए रखते थे। हमें उनकी हर इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। 

वृद्धावस्था में वृद्धों में मान-सम्मान पाने की इच्छा बढ़ जाती है वह न मिलने पर अकेलापन का अनुभव करने लगते हैं। उस स्थिति में घरवालों को चाहिए कि वृद्धों को उचित सम्मान दें।

हमें अपने बूढ़े बुजुर्गो को खाली समय में ईश्वर की आराधना तथा किसी धार्मिक पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना चाहिए। 

हमें प्रयास करना चाहिए कि घर के बच्चे बुजुर्गो के पास जायें और खेले ,बातें भी करे ताकि उनको उनकी जिंदगी में अकेलापन ना लगे । 

बूढे बुजुर्गो को भी अपने क्षमता के अनुसार घर गृहस्थी के कार्यो में सहयोग करना चाहिए। उन्हें निराशावादी विचारो को छोडकर आशावादी विचारधाराओं को बढ़ावा देना चाहिए। 

मैने काफी बूढ़े बुज़ुर्ग को नजदीकता से जानने की कोशिश की हैं ,उनके जीवन के कटु सत्य को भी सुना है वही एक सत्य मैं आप सबसे शेयर करना चाहती हूँ। 

एक दिन सुबह सुबह दरवाजे पर घंटी बजी तो देखा कि मेरी सबसे अजीज दोस्त की मॉ दरवाजे पर खड़ी थी ,एकाएक विश्वास नही हुआ ।मै घबरा गई ,ईश्वर करे सभी राजी खुशी हो ।चुपचाप आकर सोफे पर बैठ गयी और बोली घबरा मत। चिन्तावाली कोई बात नहीं। एक जरूरी सलाह लेने आयी हूँ। पल भर के लिए उन्होंने मेरी ओर देखा फिर शून्य की ओर ताकते हुए बोली कि सोचती हूँ, वृद्धाश्रम में भर्ती हो जाऊँ।यह सुनकर एकाएक झटका लगा ।कुछ देर बाद मैंने पूछा क्या बेटे बहू से लड़ाई हो गई ?वे बोलो ,नहीं! नहीं! ऐसी कोई बात नही हैं,वे तो बेचारे चोबीसो घण्टे मेरी चिन्ता करते रहते हैं। समय के हिसाब ये जितना संभव हो ध्यान रखने की कोशिश करते हैं और मेरी सारी जरूरते भी पूरी करते हैं बस मुँह से बोलने की देरी हैं ।मैने पूछा तो फिर यह वृद्धाश्रम वाली बात कहाँ से आ गई?’ अब वे बोली “मैं घर में जरूरत से ज्यादा टोका-टोकी करने लगी हूँ” जहाँ नहीं बोलना चाहिए वहाँ भी बोल देती हूँ। मैं अनुभव कर रही हूँ कि बेटे बहू भी नही बल्कि पोता पोती भी मेरी अकारण टोकाटोकी से परेशान रहते हैं। इसीलिए सोचती हूँ कि वृद्धाश्रम में भर्ती हो जाऊँ। कम से कम बच्चों को तो आराम मिले।

उनके सवाल में ही मेरा जवाब निकल आया। मैं बोली आप समस्या का कारण और उसका निदान भी जानते हैं तो उसे दूर कर दीजिए। टोकाटोकी बन्द कर दीजिए। वृद्धाश्रम जाने की क्या जरूरत है? वे बोले कि यही तो नहीं होता मुझसे। रोज सवेरे उठकर प्रण लेती हूँ कि अपने काम से काम रखूँगी और बच्चों को बिलकुल नहीं टोकूँगी किन्तु अगले ही क्षण प्रणभंग हो जाता है और मेरे कारण घर में परेशानी शुरु हो जाती है।मैंने मित्र की मॉ से पूछा कि बेटे बहू को बताई वृद्धाश्रम वाली यह बात? कैसा लगा यह सुनकर उन्हे ।इस बात से मित्र की मॉ असहज होकर बोली कि दोनो से पूछने की हिम्मत ही नहीं हुई। मॉ वृद्धाश्रम में रहे यह तो उनके लिए डूब मरनेवाली बात होगी।बोली इस विचार को तो वह खुद भी उचित नहीं मानती ।

 मैंने उनसे पूछा कि आप वृद्धाश्रम में टोकाटोकी नहीं करेंगी ।उनके चेहरे पर उलझन उभर आई। बोले कि वहाँ कौन है सुननेवाला? वहाँ तो सुननी ही सुननी है। झख मारकर चुप रहना पड़ेगा ।तनिक रूखे स्वरों में मैंने कहा यह तो कोई बात नहीं हुई। परायों, अनजानों के साथ तो आप समझौते करने को, सहयोग करने को तैयार हैं और अपनेवालों के साथ नहीं? खुद आपको अजीब नहीं लगता यह सब?वह नजरें झुकाए बोली कि मैं क्या करूँ? जानती हूँ कि अपनेवाले हैं वे जो भी कहूँगी सुन लेंगे ,इसलिये मुझसे रहा नहीं जाता और टोकाटोकी कर देती हूँ।बड़ी विचित्र स्थिति,मैंने तनिक हिम्मत करके कहा वृद्धाश्रम जाने के बजाय आप अपने मन में ही वृद्धाश्रम क्यों नहीं बसा लेते ? वृद्धाश्रम को ही घर ले आइए। जब भी टोकने की इच्छा मन में उठे तब यह सोचे कि वो वृद्धाश्रम में हैं। इस वृद्धाश्रम (यानि परिवार वालों )से शिकायत का कोई मौका शायद ही मिलेगा और साथ में बेटे बहू और पोती पोते का सुख तो मिलेगा ही।

ऐसा लगा, उन्हे मेरी बात जँच गई। बोली कि वैसे भी घर में बड़ी तो मैं ही हूँ। हर कोई मुझसे ही समझदारी की उम्मीद करेगा। यदि मैं अपनी आदतों को सुधारने में कामयाब हो गई तो स्थितियाँ बेहतर ही होंगी। यदि कामयाब नहीं हो पाई तो अभी से ज्यादा क्या खराब स्थिती होगी ।

 वास्तव में समस्या यही से आकर खड़ी होती हैं जब युवावर्ग अपने भविष्य को उज्ज्वल समझता है। वह अपना बेहतर जीवन आने वाले कल में देखता है, हमारे वृद्धजन अपने बीत चुके कल को बेहतर समझते हैं। वे भूत को वर्तमान में लाना चाहते हैं। संघर्ष का मुख्य कारण यही होता है।

कोई भी बात हमेशा पूरी की पूरी खरी नहीं उतरती,कहीं छोटे वृद्धजनो की बात नहीं स्वीकारते और उपेक्षा करते हैं तो कहीं वृद्ध लोग युवा वर्ग की परेशानियों,खुशियों को नजरअंदाज करके सिर्फ अपना दर्द बताते हैं ।कहीं बच्चे बुज़ुर्ग लोगो के साथ नहीं रहना चाहते,कहीं बुजुर्ग लोग बच्चों के साथ नही रहना चाहते । हर उम्र के लोगो की बातें अलग अलग होती हैं ।यह भी एक सच बात हैं जिसे झुठलाया नही जाता कि उम्र के हर पड़ाव के लोग स्वंत्रता की जिंदगी जीना चाहते ,उसी वजह से वृद्धलोगो और युवाओं का आपस में तालमेल नही हो पाता हैं ।एक दूसरे के हिसाब से जिंदगी जिये ,ऐसा करने के लिये जबरदस्ती की जाती हैं ।

 कहने का सारांश यह है कि कहीं बड़े गलत होते हैं, कहीं बच्चे । लेकिन कही बड़े गलत होने पर भी यही कहा जाता है कि बड़े बड़े हैं , हमारे बुज़ुर्ग हैं ,हमें कितना मुश्किल से पाल पोस कर बड़ा किया ,ऐसा कहकर युवा पीढ़ी को ही हर जगह दोषी ठहराया जाता हैं हैं,बच्चों के विचारों को दबा देते हैं ।हमे बिना सोचे समझे संवेदनशील होकर किसी को भी सही या गलत नही ठहराना चाहिये

वृद्ध और युवा पीढ़ी को एक साथ में प्रेमभाव से रहने का अच्छा और सीधा सूत्र यह है कि “वृद्ध लोग”बुढापे में अपनी जवानी के अनुभव को ध्यान में रखकर “बच्चों”के साथ व्यवहार करे तथा “युवा वर्ग” भी वृद्ध लोगो को देखकर अपने आने वाले “बुढापे”का अहसास करके उनके साथ व्यवहार करे 

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने में गलती हो गई हो तो क्षमाप्राथी 🙏🙏

           
रंगबिरंगे विचार (मेरी कलमससे)

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