भक्त की भक्ति -जिंदगी की किताब (पन्ना # 16)

भक्त की भक्ति …..कहानी के साथ…
भक्तिभाव का आधार प्रेम,श्रद्धा और समर्पण हैं ।सच्ची भक्ति से भगवान भी भक्त के वश मे हो जाते है ।यदि भक्ति शरीर के किसी भी अंगों से होती तो विकलांग कभी नही कर पाते । बोलने सुनने में होती तो गूँगे बहरे कभी नही कर पाते। धन और ताक़त से होती तो कमजोर और गरीब कभी नही कर पाते ।उदाहरण सूरदासजी का ही लेते हैं ,जो आँखें नही होते हुये भी भक्ति मे लीन रहते ।
कहने का अर्थ यह है कि भक्ति शरीर के किसी भी भाग से न होकर इंसान के भाव से होती हैं ।यह एक एहसास हैं जो ह्रदय या दिल से होकर विचारों में आती हैं ,विचारों मे आते ही प्रेम का स्वरूप ले लेती हैं और यह प्रेम ही परमात्मा से रिश्ता बनाती हैं ।

जब व्यक्ति दुनियादारी की बेमतलब बातों से दूर हटकर भक्ति करता हैं तो उसकी इच्छाये धीरे धीरे सीमित होती जाती हैं और उसमें आत्मबल बढ़ता जाता हैं जिससे उसकी शक्ति जाग्रत होती है ।परमात्मा का चिंतन करते करते ईश्वरीय भक्ति साकार होने लगती है। भक्ति थी मीरा की, चैतन्य महाप्रभु की, बुद्ध की, नानक की,हनुमान जी की,प्रह्लाद की,नरसी जी की ….

जब सब लोग रात में सो जाएं और उस समय भी जिसके मन में परमपिता को पाने की तीव्र अभिलाषा उठे, तो समझना कि वाकई में असली भक्ति हैं ।

भक्त यानि सुख और आनंद का दूसरा नाम है। जब इंसान की कामना या प्रार्थना सारी ईश्वर को समर्पित हो जाये तो समझना असली भक्ति हैं ।भक्त ही एकमात्र ऐसा है जो हृदय से भगवान को याद करता हैं और ईश्वर भी स्वयं को उसके अधीन कर देते हैं। इसलिए कहा भी गया है कि सच्ची भक्ति से भगवान भी भक्त के वश में हो जाते हैं।

भक्तिभाव का आधार प्रेम, श्रद्धा और समर्पण है। भगवान राम ने शबरी के झूठे किए बेर भी प्रेम और भक्तिभाव के कारण खाए थे। मन में भक्ति भाव के उठने के बाद भक्त के व्यक्तित्व के नकारात्मक गुण दूर हो जाते हैं और उसके व्यक्तित्व में निखार आने लगता हैं । भक्त अपने अहंकार से मुक्त हो जाता हैं और उसकी आंतरिक चेतना में ईश्वर की अनुभूति होने लगती है।ऐसे ही भक्त “नरसी जी “की कृष्ण भक्ति थी ।

नरसी जी की भक्ति…नानी बाई का मायरो ….

नरसी जी का जन्म जूनागढ़ के समीपवर्ती “तलाजा” नामक ग्राम में हुआ था और उनके पिता का देहांत हो जाने पर बाल्यकाल से ही नरसी जी को कष्टमय जीवन व्यतीत करना पड़ा। साधु संग उनको अच्छा लगता था।नरसीजी घर के काम काज में बिलकुल भी ध्यान नहीं देते थे (इस कारण एक बार गृह त्याग भी करना पड़ा) सारा समय कृष्ण भक्ति में ही लगे रहते।इस कारण उनके भाई ने उनकी शादी माणिकबाई से कर दी ताकि वो घर की जिम्मेदारी सँभालने लगें, लेकिन शादी से भी नरसिंह को कोई फर्क नहीं पडा । माणिकबाई से कुँवर बाई तथा शामलदास नामक दो संतानें हुई। बेटी की शादी हो गई । सालों बाद नरसी जी को खबर मिली कि बेटी की भी बेटी यानि दोहिती की शादी होने वाली हैं ।अब रिवाज के अनुसार नरसी जी को मायरा करना था ।

नरसी जी गरीब ब्राह्मण थे । मायरा भरना नामुमकिन था। लेकिन शादी में भी जाना था ,तो वह कुछ भी मायरे के लिये सामान ले जाने की बजाय,मायरे में उच्च कुलीन वर्ग के लोगों के स्थान पर 15-16 वैष्णव भक्तों की टोली के साथ अंजार नगर पहुच गए, जो उनकी बेटी का ससुराल था । नरसी जी को कम “औकात” के चलते उनके तरह तरह के अपमान किये गए। पर सब कुछ उन्होंने भगवान के चरणों में चढ़ा दिया, सब सहा।पर भगवान से नहीं सहा गया। उनका मायरा श्री कृष्ण ने ही एक सेठ बनकर,बेटी के ससुर जी (समधी श्रीरंग जी)द्वारा जो सामान की सूची बनाई गई थी, उससे कही ज्यादा भर भर कर दिया ,जो की राजा ,महाराजाओ से भी बढ़कर था। समधी(श्रीरंग जी) का परिवार अाश्चर्य चकित होकर उस सेठ को देख कर सोच रहा था कि ये कौन है? कहॉ से आया है? और नरसी जी की मदद क्यों की? नरसी से इसका क्या रिश्ता है?आखिर बेटी के ससुर जी श्रीरंग जी ने उस सेठ से पूछ ही लिया “कृपा करके बताएँ आप नरसी जी के कौन लगते हैं।उस सेठ(कृष्ण भगवान) ने उत्तर में कहा “ये जो नरसी जी हैं ना, मैं इनका गुलाम हूँ। ये जब, जैसा चाहते हैं वैसा ही करता हूँ। जब बुलाते हैं हाज़िर हो जाता हूँ। इनका हर कार्य करने को तत्पर रहता हूँ। उत्तर सुनकर समस्त समधी परिवार हक्का बक्का रह गया। ऐसी थी नरसी जी की भक्ति ।इसी तरह भगवान ने कई बार नरसीजी की मदद की। इनमें “हुंडी”, “झारी”, “मामेरु” और “हार” का प्रसंग सर्वप्रमुख है। “ढेढ” प्रसंग भी नरसी की जीवनी में यथेष्ट महत्व रखता है क्योंकि उसके फलस्वरूप उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया था ,कारण कि वे स्त्री और शूद्र को भी भक्ति का अधिकारी समझते थे ।

इसलिये काफी कथाओं में यह दर्शाया जाता हैं कि जहाँ भगवान कहते हैं कि वे अपने भक्तों के वश में रहते हैं। क्यों कि भक्तो में ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण भावना होती हैं।

बहू की भक्ति -कथा दो

एक सासु माँ और बहू थी।सासु माँ हर रोज ठाकुर जी की पूरे नियम और श्रद्धा के साथ सेवा करती थी। एक दिन शरद ऋतु मेँ सासु माँ को किसी कारण वश शहर से बाहर जाना पडा।सासु माँ ने विचार किया कि ठाकुर जी को साथ ले जाने से रास्ते मेँ उनकी सेवा-पूजा नियम से नहीँ हो सकेँगी। इसलिये अब ठाकुर जी की सेवा का कार्य बहू को देना चाहिये । सासुमॉ ने सोचा कि बहू को तो कोई अक्कल ही नहीँ कि ठाकुरजी जी की सेवा कैसे करनी हैँ फिर भी लाचार होकर सासु माँ ने बहू को बुलाया ओर समझाया कि ठाकुर जी की सेवा कैसे करनी है।कैसे ठाकुर जी को लाड लडाना है। सासु माँ ने बहू को कहा ,देख ऐसे तीन बार घंटी बजाकर सुबह ठाकुर जी को जगाना।फिर ठाकुर जी को मंगल भोग कराना।फिर ठाकुर जी स्नान करवाना।ठाकुर जी को कपड़े पहनाना।फिर ठाकुर जी का श्रृंगार करना ओर फिर ठाकुर जी को दर्पण दिखाना।दर्पण मेँ ठाकुर जी का हंसता हुआ मुख देखना बाद मेँ ठाकुर जी राजभोग लगाना इस तरह सासु माँ बहू को सारे सेवा नियम समझाकर यात्रा पर चली गई। अब बहू ने ठाकुर जी की सेवा कार्य उसी प्रकार शुरु किया जैसा सासु माँ ने समझाया था।सबसे पहले ठाकुर जी को जगाया, नहलाया,कपड़े पहनाये,श्रृंगार किया,और दर्पण दिखाया।फिर याद आया कि सासु माँ ने कहा था कि दर्पण मेँ ठाकुर जी को हँसता हुआ देखकर ही राजभोग लगाना। दर्पण मेँ ठाकुर जी का हँसता हुआ मुख ना देखकर बहू को बड़ा आश्चर्य हुआ।बहू ने विचार किया शायद मुझसे सेवा मेँ कही कोई गलती हो गई हैँ ,तभी दर्पण मे ठाकुर जी का हँसता हुआ मुख नहीँ दिख रहा।

बहू ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया,श्रृंगार किया,दर्पण दिखाया।लेकिन ठाकुर जी का हँसता हुआ मुख नहीँ दिखा। बहू ने फिर विचार किया कि शायद फिर से कुछ गलती हो गई।बहू ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया, श्रृंगार किया,दर्पण दिखाया।जब ठाकुर जी का हँसता हुआ मुख नही दिखा बहू ने फिर से ठाकुर जी को नहलाया ।ऐसे करते करते बहू ने ठाकुर जी को 12 बार स्नान कराया ।हर बार दर्पण दिखाया मगर ठाकुर जी का हँसता हुआ मुख नहीँ दिखा।अब बहू ने 13वी बार फिर से ठाकुर जी को नहलाने की तैयारी की।

अब ठाकुर जी ने विचार किया कि यदि अब इसको मेरा हँसता हुआ मुख नहीँ दिखा तो ये आज पूरा दिन नहलाती रहेगी।अब फिर बहू ने जैसे ही ठाकुर जी को दर्पण दिखाया तो ठाकुर जी अपनी मनमोहनी मंद मंद मुस्कान से हंसे।बहू को संतोष हुआ कि अब ठाकुर जी ने मेरी सेवा स्वीकार करली ।अब यह रोज का नियम बन गया,ठाकुर जी रोज हंसते। सेवा करते करते अब तो ऐसा हो गया के बहू जब भी ठाकुर जी के कमरे मेँ जाती ,बहू को देखकर ठाकुर जी हँसने लगते।

कुछ समय बाद सासु माँ वापस आ गई। सासु माँ ने ठाकुर जी से कहा की प्रभु क्षमा करना अगर बहू से आपकी सेवा मेँ कोई कमी रह गई हो तो ।अब मैँ आ गई हूँ,आपकी सेवा पूजा बड़े ध्यान से करुंगी।

तभी सासु माँ ने देखा की ठाकुर जी हंसे और बोले की मैय्या आपकी सेवा भाव मेँ कोई कमी नहीँ हैँ आप बहुत अच्छी सेवा करती हैँ ।लेकिन मैय्या दर्पण दिखाने की सेवा तो आपकी बहू से ही करवानी है इस बहाने से मैं भी हँस तो लेता हूँ।

तो देखा कि भाव भक्ति में कितनी शक्ति होती हैं ।

लिखने मे ग़लती हो गई हो तो क्षमाप्राथी 🙏🙏

                   जय सच्चिदानंद 🙏🙏
रंगबिरंगे विचार (मेरी कलमससे)

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