प्रेम(भक्ति)-जिंदगी की किताब (पन्ना # 7)

प्रेम(भक्ति)…….
असली प्रेम करने का अर्थ है, दूसरों पर बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करना। यह प्रेम अपेक्षा युक्त सांसारिक प्रेम से भिन्न बिना किसी शर्त के, भेदभाव के,सर्वव्यापी ईश्‍वरीय प्रेम, जो ईश्‍वर द्वारा निर्मित सभी विषय वस्तुओं के लिये होता है ।

उदाहरण के लिये निर्जीव वस्तुओं से लेकर चींटी जैसे छोटे से प्राणिमात्र से लेकर सबसे बडे प्राणिमात्र मनुष्य तक को व्याप्त हैं।
प्रेम और भक्ति के अनेक उदाहरण मिलते हैं ।मीराबाई का ही उदाहरण लेते हैं जिसमें उन्होंने हँसते हँसते ज़हर का प्याला पी लिया। मीरा बाई कृष्ण भक्त थीं तथा भगवान श्रीकृष्ण को को समर्पित होकर भजन में लीन रहती थी ।मीराबाई का जन्म राजस्थान के एक राजघराने में हुआ था। इनके पिता मेड़ता के राजा थे| जब मीरा बाई बहुत छोटी थी तो उनकी माता ने श्री कृष्ण जी को यूँ ही उनका दूल्हा बता दिया| इस बात को मीरा बाई ने सच मानकर श्री कृष्ण जी को ही अपना सब कुछ मान बैठी।उनका ,लालन-पालन उनके दादा के देख-रेख में हुआ जो भगवान् विष्णु के गंभीर उपासक थे और एक योद्धा होने के साथ-साथ भक्त-हृदय भी थे और साधु-संतों का आना-जाना इनके यहाँ लगा ही रहता था। इस प्रकार मीरा बचपन से ही साधु-संतों और धार्मिक लोगों के सम्पर्क में आती रहीं। मीराबाई ने खुद की जीवन में बहुत दुख सहा था। 

मीरा बाई के जीवन के बारे में यह भी पता चलता है की किस प्रकार से मीराबाई ने सामाजिक और पारिवारिक रिवाज का बहादुरी से मुकाबला किया और कृष्ण को अपना पति मानकर उनकी भक्ति में लीन हो गयीं।

जवानी की अवस्था में पहुँचने पर भी उनके प्रेम में कमी नहीं आई| उनकी कल्पनाएँ, उनके सपने श्री कृष्ण जी से आरम्भ होकर उन्ही पर ही समाप्त हो जाते|समय बीतता गया| मीरा जी का प्यार कृष्ण के प्रति और बढता गया । 

मीरा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से कर दिया गया| वे मीरा के प्रति स्नेह का भाव रखते ,परन्तु वह अपने विवाह के बाद भी कृष्ण को ही अपना पति समझती और वैराग्नियो की तरह उनके भजन गाती| मेवाड़ के राजवंश को यह सब स्वीकार नही था ।उन्हें मारने के लिये विष का प्याला दिया गया,साजिशे रची जाने लगी| मीरा की भक्ति, प्रेम निश्छल था इसलिए विष भी अमृत हो गया| उन्होंने अपना पूरा जीवन कृष्ण को ही समर्पित कर दिया| मीराबाई ने कहा कि बिना गुरु धारण किए भक्ति नहीं की जा सकती| भक्तिपूर्ण व्यक्ति ही प्रभु प्राप्ति करा सकता है वही सच्चा गुरु है|उनके गुरू रविदास थे।

प्रेम (भक्ति)……..जानिये भजन से….

ज्योत से ज्योत जलाते चलो,प्रेम की गंगा बहाते चलो।

रास्ते मे मिले जो भी दुखियारी,पूछो जरा उनको क्या तकलीफ़ हैं भाई 

ऐसे ही सब दीन दुखियों से ,पूछ पूछ कर बेहिसाब सहारा देते चलो।

प्रेम की गंगा बहाते चलो…….

ढूँढा मगर ना हैं कोई यहॉ किसी का संग,ना किसी का साथी

फिर भी क्यूँ घबराना ,बस हमारा साथ हैं ईश्वर का काफी।

ज्योत से ज्योत जलाते चलो प्रेम की गंगा बहाते चलो।

जो भी इंसान निर्धन या निर्बल है ,दे सको तो दे दो कुछ भी सहारा 

सहारा देते देते ऐसे ही ,बस आगे बढ़ते चलो।

प्रेम की गंगा बहाते चलो…

सब ही तो हैं प्रभु के प्यारे,सभी अपने हैं ना कोई पराया 

फिर क्यूँ रखे भेदभाव ,बस प्यार के मोती यूँ ही लुटाते चलो।

ज्योत से ज्योत जलाते चलो,प्रेम की गंगा बहाते चलो।

आशा टूटे या ममता रूठे,बंद ना करो यूँ दया का द्वार।

दीप दया का जलाते चलो ,धरती को स्वर्ग बनाते चलो।

प्रेम की गंगा बहाते चलो…

कौन है ऊँचा कौन है नीचा ,सब मालिक के है एक ही बंदे , क्या तेरा या क्या मेरा ,इस झूठे भ्रम को हटाते चलो।

ज्योत से ज्योत जलाते चलो प्रेम की गंगा बहाते चलो।

सारे जगत के कण कण में,सब में ईश्वर ही समाया।

सभी प्राणो से प्राण को मिलाते चलो,एक ही हैं परमात्मा स्वीकारते रहो

ज्योत से ज्योत जलाते चलो प्रेम की गंगा बहाते चलो…..

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने मे ग़लती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

 

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