कुछ तो लोग कहेंगे,लोगो का काम हैं कहना-जिंदगी की किताब (पन्ना # 8)

कुछ तो लोग कहेंगे,लोगो का काम हैं कहना ……
जी हॉ दोस्तों ,व्यक्ति अपनी सामाजिक और पारिवारिक जीवन मे पूरी जिंदगी इसी सोच मे पूरी कर लेता हैं कि क्या कहेंगे लोग । यदि “कहने वाले” लोगो की सूची बनाये तो इंसान को खुद पर हँसी आयेगी कि इतने कम लोग हैं जिनको वह अपनी जिंदगी की धुरी बना लेता हैं , इस कारण व्यक्ति अपनी पसंद के लक्ष्य को हासिल करने से चूक जाता हैं । यहॉ तक की बात होती तो कोई हर्ज नही लेकिन इंसान को जो अत्यंत दुर्लभ मनुष्य जीवन “अनंत भवो”को पार करके मिला हैं ,वह उसे इन्हीं बातों मे फँसकर अन्य व्यक्तियों के साथ इतने कषाय कर लेता हैं कि वह अपना अगला भव बिगाड लेता है।

प्राय: इंसान के दो रूप होते हैं ,उसमें पहला रूप यानि असली रूप जो बचपन से उत्पन्न होता हैं जिसमे किसी की भी परवाह नहीं , निष्कपट, कुछ भी कर गुजरने की जिद , नया सीखने का साहस होता हैं ।दूसरा रूप बड़े होने पर उदय होता हैं जो दूसरे लोगो के सोच के मुताबिक़ टिका होता हैं या यूँ बोल सकते हैं जिसको जमाने ने अपनी दौड़ में शामिल कर लिया । वह कुछ भी करने से पहले “लोग क्या कहेंगे “सोचने लगता है 

इंसान के अन्य रोगो की तरह यह भी एक सबसे बड़ा रोग है “क्या कहेंगे लोग” हैं। दूसरे क्या चाहते हैं , उनके हिसाब से व्यक्ति पूरा जीवन दौड़ते जाता हैं और धीरे धीरे अपनी वास्तविकता खो देता हैं ।

धन के हिसाब से बात की जाये व्यक्ति पूरी जिंदगी समाज मे अपना स्थान या स्टेटस बनाने के लिये ,तारीफ सुनने के लिये दिन रात मेहनत करके जमा पूँजी इकट्ठा करता रहता हैं और अपनी कमाई आधुनिक भौतिक संसाधनों( बंगला ,गाड़ी ,नौकर चाकर आदि आदि….)में खर्च करता हैं ताकि लोग उसको कंजूस या गरीब लोगो के नाम की सूची में शामिल न कर दे और साथ मे यह डर भी होता है कि लोग उसके बारे मे क्या कहेंगे कही कोई व्यक्ति उसका अपमान न कर दे । 

“लोग क्या कहेंगे “इस संदर्भ मे एक लघु कथा याद आती हैं 👇👇

एक समय की बात हैं,पिता और पुत्र दोनों एक घोड़ा लेकर एक गॉव से दूसरे गॉव जा रहे थे। रास्ते में कोई न कोई आदमी मिलता और हालचाल पूछ लेता ।इसी दौरान किसी आदमी ने उन दोनों को देखा और जानबूझ कर तेज़ आवाज़ मे बोलने लगा कितने बेवकूफ हैं, घोड़ा साथ होते हुए भी पैदल चल रहे हैं।” यह सुनकर वे दोनों घोड़े पर बैठकर चलने लगे। अभी थोड़ा आगे ही गए थे कि कुछ और लोग मिले और बोलने लगे कि कितने क्रूर ये ,जो बेचारे एक घोड़े पर दो जने बैठे हैं।यह सुनकर पुत्र उतर गया और पिता घोड़े पर ही बैठा रहा।थोड़ी दूर ओर चले तो कुछ लोगों ने फिर ताना कसा, कितना निर्दयी पिता है, खुद तो बैठा है और पुत्र को पैदल चला रहा है।यह सुनकर पिता घोड़े से उतर गया और पुत्र को घोड़े पर बैठा दिया। फिर आगे चले तो कुछ लोग पुत्र को कोसने लगे कि खुद घोड़े पर बैठा है और अपने पिता को पैदल चला रहा है।

कहने का अर्थ यह है कि आप जो कुछ भी करोगे ,सामने वाला उसमें कोई न कोई दोष ढूंढ ही लेगा।पूरी ज़िंदगी सिर्फ दूसरे से तारीफ पाने के लिये अपनी स्वतंत्र जिंदगी का मालिक दूसरे लोगो को बना देते हैं यहॉ तक कि जिंदगी के हर छोटे से छोटे काम भी उनके मुताबिक़ करते हैं ।इस कारण अपनी पसंद के काम या ऐसे भी बोल सकते है कि हम अपनी वास्तविकता ही भूल जाते हैं। 

इंसान धर्म के मामले मे भी ,लोगो को दिखाने के हिसाब से धार्मिक कार्य करता हैं ताकि समाज में उसके नाम की तख्ती लगे और साथ ही साथ उनके मान सम्मान मे भी कोई कमी न आये ।उसको यह मान इतना मीठा लगता है कि वह अपने दिल की भी नही सुनता ।

“दोस्तों”!!ये गीत पढ़िये कितनी सच्चाई छुपी हैं जिंदगी की..

कुछ तो लोग कहेंगे ,लोगो का काम है कहना

छोड़ो बेकार की बातो में ,कही बीत न जाये उम्ररिया……

कुछ तो लोग कहेंगे …….,

धर्मों में ऐसा होने लगा ,बोलबाला पाखंड का बढने लगा

तुने किस मकसद से जन्म लिया,तु कौन हैं,तेरा नाम है क्या

इन सब बातों को भूलाकर फिर क्यूँ,अनंत जन्मों की तैयारी करने लगा ।

कुछ तो लोग कहेंगे ,लोगो का काम है कहना

छोड़ो बेकार की बातो में ,कही बीत न जाये उम्ररिया…..

कौन है अपना ,कौन है पराया,सारी उम्र तु ,जान ना सका 

रिश्तों का नाम दे देकर,दिन रात तु ढूँढ रहा हूँ शान्ति, सुख

सुख शान्ति की पाने के भ्रम में,अनंत भवो की मोहर लगा डाली 

कुछ तो लोग कहेंगे ,लोगो का काम है कहना

छोड़ो बेकार की बातो में ,कही बीत न जाये उम्ररिया……

दिन रात दौड़ा, पैसों के लिये। पैसों को तुने , अपना आधार बनाया  

सिर्फ सम्मान,रूतबा पाने की खातिर,क्यों अनमोल जीवन यूँ ही बरबाद किया ।

कुछ तो लोग कहेंगे ,लोगो का काम हैं कहना

छोड़ो बेकार की बातों में ,कही बीत ना जाये उम्ररिया……

हम अपने बच्चों का भविष्य भी लोगो को ध्यान मे रखकर सोचते हैं ।उदाहरण के लिये जैसे बेटी बोलती है कि मुझे क्रिकेटर बनना हैं तो पैरेंट्स का जवाब मिलता है कि सब लोग हंसेंगे और”लोग क्या कहेंगे”।इसी तरह बेटी -मुझे नेता बनना हैं या बिज़नेस करना हैं तो सब मे यही बोला जाता है कि शादी के बाद जो दिल मे आये करना ।अभी करेंगी तो “लोग क्या कहेंगे”।

शादी मे भी रीति रिवाज लोगो के हिसाब से तय किये जाते है ताकि समाज मे उनको वाहवाही मिले, साथ मे ये भी विचार चलता है कि ऐसा नही किया तो लोग क्या कहेंगे । 

सब मिलाकर यही बोल सकते हैं कि मनुष्य पूरी जिंदगी “लोग क्या कहेंगे ” के डर से अपनी स्वतंत्रता को खोकर अपने विचारों का मालिक लोगो को बना देता है और एक तरह से लोगो के विचारों की गुलामी मे पूरी जिंदगी व्यतीत कर लेता है ।यहॉ तक कि मनुष्य जीवन मिलने का मकसद क्या हैं वह भी भूल जाता हैं और जाने अंजाने मन में कितने ही कषाय खड़े करके ना जाने कितने अनंत भवों की जीवन यात्रा की तैयारी की शुरूआत कर लेता है ।

इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति अपनी क्षमता और सपनों के हिसाब से कोई कदम उठाता हैं ,तो लोग ऐसे ऐसे कटाक्ष कहने से नही चुकेंगे ,जिसको सुनकर अधिकतर लोग मंज़िल पाने से पहले ही रूक जातें हैं ।इस तरह पूरी जिंदगी ऐसे ही सोच मे चली जाती हैं “क्या कहेंगे लोग”

याद रखो दोस्तों जिन लोगों ने भी इस भेड़चाल से बाहर निकलकर अपनी खुद की आवाज़ सुनी है और कुछ अलग करने का साहस किया हैं ,उन्ही लोगों ने इतिहास रचा हैं।

आज दुनिया में इतने अनगिनत शारीरिक रोग और बीमारियाँ फैली है जिसका डॉ ईलाज करके ठीक करने की कोंशिश करता हैं लेकिन मेरी नजर में यह रोग व्यक्ति की खुद की ही सोच है “क्या कहंगे लोग”।इस सोच ने दुनिया में बहुत सारे लोगों को सफल होने से रोक रखा है ,वे जीवन में ना तो अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ पाते है और ना ही कभी खुश नही रह पाते हैं।

कोई ख़राब न कह दे इससे डरकर व्यक्ति लोगो को ख़ुश करने के लिये उनके हिसाब से ताउम्र काम करते हैं फिर भी लोग खुश नही हो पाते हैं क्योकि वह भूल जाता हैं कि चाहे कितना भी खुश करने के लिये काम किया जाये लेकिन उनके मन में जैसी बात आएगी वे वैसा ही कहेंगें ।

लोग क्या कहेंगे इसको न सोचकर अपने लक्ष्य पर पूरे विश्वास के,अच्छे भाव से ,बिना किसी अपेक्षा से ,दृढ़ता के साथ लगे रहो तो यह बहुत बड़ी बात होगी ।

 अगर आप इंतज़ार कर रहे है कि लोग आपको वाक़ई में दिल से अच्छा कहे तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल होगी ।कहा जाता हैं “अच्छा मत कहलवाओ अच्छा बनो”।

जब हम लॉकर की चाबी भी भूल से दूसरों के हाथों में नही देते है तो क्यों अपनी ख़ुशियाँ और लक्ष्य जैसी बेशक़ीमती चाबियॉ लोगो के हाथ मे दे देते हैं सिर्फ़ इस डर से कि लोग क्या कहेंगे ।

अगर लोग आपकी थोड़ी सी तारीफ कर देते है तो , आप खुश हो जाते हो और अगर कोई थोड़ी सी बुराई कर देते है तो आप दुखी हो जाते है इसका मतलब तो हम अपनी ख़ुशी ,गम के लिये भी लोगो पर निर्भर हो जाते हैं एक तरह से हम लोगो को अपनी ज़िंदगी का मालिक बना देते हैं ।

अब आप खुद ही सोचिये कि – जिंदगी भर”लोग क्या कहेंगे” के डर कर जीना या अपनी खुद की स्वतंत्र जिंदगी जीना।  

व्यक्ति हर काम”लोग क्या कहेंगे” की बातों को मद्देनजर रखकर करते हैं यहॉ तक कि उसको लोगों की इतनी अधिक परवाह होती है कि वह खुद को दुःख में रखकर कषाय (क्रोध,मान ,माया,लोभ)होने पर भी वही करते हैं जो दुसरे लोगों को खुश कर सके।लेकिन यदि कोई कार्य इस डर से ऊपर उठ कर किया जाता हैं जिसके करने से हमें खुशी मिलती हैं,शांति मिलती हैं तो वह कार्य जरूर करना चाहिये ।

एक सर्वे के मुताबिक ….

25 साल की उम्र तक हमें परवाह नहीँ होती कि “लोग क्या सोचेंगे” 

50 साल की उम्र तक इसी डर में जीते हैं कि”लोग क्या सोचेंगे ”

50 साल की उम्र के बाद पता चलता है कि हमारे बारे में कोई सोच ही नहीँ रहा था 

हमें वही कार्य करना चाहिये जो स्वयं को उचित लगे, अपने व परिवार और समाज के हित में हो।

“लोग तो कुछ कहेंगे’ लोगो का काम हैं कहना – ये सूत्र को ध्यान में रखकर जो कोई भी इंसान अपनी पसंद का कार्य करता हैं वह निश्चय ही अपने लक्ष्य को पा लेता हैं । लेकिन इसमें इंसान को अपना अहंकार को तोड़ना पड़ता हैं ।

लिखने मे भूल हो गई हो तो क्षमाप्राथी 🙏🙏

               जय सच्चिदानंद 🙏🙏
रंगबिरंगे विचार (मेरी कलमससे)

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4 Comments Add yours

  1. sonia yadav says:

    Sach kha ap ne bulkul dil ko chune bali bat kahi ap ne

    Liked by 1 person

    1. धन्यवाद 🙏🙏
      अधिकांश मनुष्य अपनी ऑरिजनलिटी को छोड़कर, “लोग क्या कहेंगे “ये सोचकर अपनी जिंदगी पूरी कर लेते हैं

      Liked by 1 person

      1. sonia yadav says:

        Log kya sochte hai ya ham kyu soche

        Liked by 2 people

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