कितना सुंदर है मन का संसार ……

कितना सुंदर है मन का संसार ……

ईश्वर को करूँ धन्यवाद या करूँ शुक्रिया आज ,
जिसने बनाया ये , मन का कितना सुंदर संसार ।
वास्तविकता के धरातल पर 
 मैं बहुत खुश हूँ आज
जितनी चादर थी 
उतना ही पॉव फैलाया आज
इसलिये बहुत खुश हुँ मै आज

इच्छाओं को कम करके 
तृप्ति की खुशी ख़रीदी आज
सबने ख़रीदा सोना-चॉदी ,
पर मैने  खरीदी एक सुई आज ।
सपनों को बुनने जैसी
ख़रीदी एक डोरी आज ।
इच्छाये ख़रीदी  दोस्तो ने आज ,
उनकी हंसी से खरीदी खुशी आज
दिन को बेचा 
खरीद ली खुशी की शाम
शौक ज़िन्दगी के कम कर दिये आज 
शुकुन की ज़िंदगी खरीद ली आज ।
हँसा करो जब भी करो कोई बात,
साथ मे  थोड़ा सा मुस्कुरा भी लिया करो ।
चाहे कैसा भी हो दर्द यहॉ पर ,
दर किनार कर लो आज
जीवन भी एक दरिया है,
तैराकी बन कर रहा करो । 
रूकावटे आयेगी हर पथ पर ,
लेकिन बढते जाना हर पल
जीत की मंजिल दूर नही
क़दम चूमेगी किसी भी क्षण

वास्तविकता के धरातल पर आकर ,आज मैं बहुत खुश हूँ ।
जितनी चादर उतना ही पाव फैलाया ,इसलिये भी खुश हुँ आज
 बहुत सुंदर है यह संसार,महसूस कर करके उसे और सुंदर बनाया करो ।

जब भी करो कोई बात , हरदम मुस्कराहट चेहरे पर लाया करो 

करो हमेशा धन्यवाद ईश्वर को ,जिसने बनाया ये कितना सुंदर संसार,कितना सुंदर संसार ….

जय सच्चिदानंद 🙏🙏

लिखने मे गलती हो तो क्षमाप्राथी

2 . कविता – मन की सफाई

सोचा आज घर की सफाई कर ही डालू। सफाई करते करते साथ मे मन के हर कोने की भी सफाई कर डाली ।

सफ़ाई की तो घर के कोने कोने में कई जगह पाई गई आलतू फालतू की चीजे, 

एक कमरा झाड़ा तो उसमें से धूल मिट्टी उड़ी और साथ मे उड़ा ढेर सा कूडा मान सम्मान की चाह का ।

दूसरा कमरा झाड़ा तो उसके हर कोने में मिले सड़ी गली चीजो के गंदगी के ढेर

और साथ मे निकले मेरे दबदबे,रौब और अपेक्षाओ के बड़े से बड़े अनगिनत ढेर

तीसरा कमरा खोला तो निकला बहुत सारे अहंकार का भारी भरकम गठ्ठर

आगे तो मैं चाहकर भी और सफाई की हिम्मत नही जुटा पाया,

इतने से ही लगा मानो गिर गया सिर पर गिर गया एक बड़ा सा पत्थर

सोच सोच कर सिर तेजी से घूम रहा था कि कैसे कैसे इतना सब जमता गया। 

पता चला जब कारण इसका ,अहंकार की अनूभुती में खोता गया ।

बताया किसी गुरूजी ने, मान-सन्मान की चाहत का छूत सा फैला हुआ यह रोग , जिससे आज इससे कोई नहीं रह गया अछूता

एक बार जो लग गया तो अनियंत्रित होकर फैलता है जोर ।

इलाज तो बहुत मामूली सा है, पर विडम्बना इस बात की है कि कोई नहीं इसको लगाना चाहता है जोर ।

बटन कोई ग़लत दबा है उसे सही बस कर लेना है।

इच्छाओ,अपेक्षाओ की चादर को उतार कर दूर कहीं रख देना है। 

मन मंदिर में “मान-प्रतिष्ठा ” का प्रवेश ही नही करवाना हैं

इच्छा हो,पर गुम्बज की नहीं, नींव के पत्थर की हो विशेष। 

प्रसिद्धि पाने के उद्देश्य से ,कोई काम न हो कभी। 

वीतराग भावना रहे हमेशा ,यदि मिल भी जाए प्रशंसा कभी। 

 यदि यह भावना सफल हो जाये तो ,मिट जाएगी सदा सदा के लिए जिंदगी की यह “मृगतृष्णा”।

सफाई करने चली थी घर की,पर ख़्यालों मे जाते जाते पहुँच गई मन पर

मन पर आते ही विचार ,तो टटोला ख़ुद को अपने आप 

टटोला तो पाया ,ढेर सारे कूड़े का अहसास 

अपने पर विश्वास नही हो रहा ,क्या वाकई मे ऐसा कूडा लेकर घूम रही 

लेकिन वास्तविकता को झुठला नही सकी ,आया एकदम से विचार 

उठी एकाएक और मन के कूड़े कचरे को फैंक दिया एक साथ 

आज लगा हल्कापन मुझमें,सोचा करूँ आसमान की सैर 

क्योंकि पलभर में मैने कर डाली 

लिखने मे गलती हो तो क्षमायाचना 🙏🙏

                जय सच्चिदानंद 🙏🙏
रंगबिरंगे विचार (मेरी कलमससे)

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